हम पहाड़ों की कल्पना करते हैं, तो हमारे मन में तुरंत एकचित्र उभरता है, वह है कल-कल बहती नदी, नौले , और दिन-रात मेहनत करती पहाड़ी महिलाएं। ये महिलाएं न सिर्फ घर संभालती हैं, बल्कि घास काटते हुए, जानवरों की देखभाल करते हुए और खेतों में काम करते हुए भी दिखती हैं। तकनीक के इस युग में भी, उनके जीवन का संघर्ष और प्रकृति से उनका जुड़ाव कम नहीं हुआ है।
बारिश हो या गर्मी की तेज़ धूप, वे हमेशा खेतों में काम करती नज़र आती हैं। ऐसा लगता है मानो वे संघर्ष करने के लिए ही बनी हों। यह वास्तविकता दिखाती है कि उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति आज भी काफी हद तक पुरुषों पर निर्भर है। हालाँकि, कुछ बदलाव हो रहे हैं, लेकिन अधिकांश जगहों पर उनकी स्थिति आज भी वैसी ही है, जैसी दशकों पहले थी।

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‘यमुना’ और ‘हे ब्वारी’:


दो उपन्यासों, ‘यमुना’ और ‘हे ब्वारी’ (त्रेपन सिंह चौहान) द्वारा लिखे गए हैं। ये उपन्यास पहाड़ों और वहाँ की महिलाओं की स्थिति को बहुत गहराई से दर्शाते हैं। यह उपन्यास लेखक के सामाजिक आंदोलनों और साहित्य के लिए जाना जाता है, और ये यमुना, हे ब्वारी उपन्यास इस बात का प्रमाण हैं।
‘यमुना’ उपन्यास विशेष रूप से उत्तराखंड आंदोलन के दौरान हो रहे बदलावों को चित्रित करता है। यह 2007 में लिखा गया था, और इसका दूसरा भाग ‘हे ब्वारी’ 2014 में आया। यह उपन्यास उत्तराखंड की सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति को दिखाता है। इसमें सरल और सीधी भाषा का प्रयोग किया गया है ताकि आम लोग भी इसे

आसानी से समझ सकें।
निराशा के आगे एक रोशनी है,
जरा घर से निकल के देखो यारों,
जो लोग सड़कों पर लड़ रहे हैं
उनके साथ जरा मुठ्ठी तो तानो यारों।

किताब में उद्धृत हरीश का कथन ‘जब नया राज्य बनेगा तब तो और भी बुरा वक्त आ सकता है…’ उत्तराखंड आंदोलन के दौरान की राजनीतिक और सामाजिक जटिलताओं को दर्शाता है। यह दिखाता है कि आंदोलनकारियों के मन में किस तरह के संदेह और चिंताएं थीं। हरीश का यह दृढ़तापूर्ण बयान कि वह अपनी आत्मा की आवाज को अनसुना नहीं करेगा, आंदोलन के प्रति उनकी ईमानदारी और जनहित के लिए उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह लोगों के बीच उत्तराखंड के भविष्य पर सवाल उठाने का आग्रह करता है, भले ही लोग उन्हें पागल कहें। यह एक सच्चा आंदोलनकारी ही कह सकता है, जो अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता।


महिलाओं का जीवन और संघर्ष


‘यमुना’ और ‘हे ब्वारी’ जैसे उपन्यास पहाड़ी महिलाओं की उन कहानियों को सामने लाते हैं जो अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। ये उपन्यास उनके संघर्ष, उनकी सहनशीलता और उनके अदम्य साहस की गाथाएं हैं। ये दिखाते हैं कि कैसे वे न केवल अपने परिवार को पालने के लिए बल्कि अपने समुदाय और संस्कृति को भी बचाए रखने के लिए अथक प्रयास करती हैं।
यह लेख पहाड़ी जीवन की एक सच्ची और भावुक तस्वीर प्रस्तुत करता है, जो हमें वहाँ के लोगों, विशेषकर महिलाओं के संघर्षों और सपनों को समझने में मदद करता है। यह हमें यह भी याद दिलाता है कि साहित्य और कला कैसे समाज की वास्तविकताओं‌ को दर्शाने और उन्हें लोगों तक पहुँचाने का एक शक्तिशाली माध्यम हो सकते हैं।

चेतना पाटनी
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