उत्तराखंड जिसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है अपनी प्राकृतिक सुंदरता संस्कृति आध्यात्मिक के लिए प्रसिद्ध है यहां के पहाड़ खेत समाज यहां के सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। जो विश्व भर में प्रसिद्ध है उसी प्रकार यहां के लोक पर्व और त्योहार भी उत्तराखंड की संस्कृति परंपराओं को दर्शाते हैं,इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण पर्व है सातु-आठू जो कुमाऊं क्षेत्र में अगस्त- सितंबर माह में बड़े धूमधाम और पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जाता है भाद्र मास के बिस पंचमी को बिरुड़े भीगाये जाते हैं जिसे होते हैं बिरुड़ा पंचमी कहते हैं ।

इस पर्व की शुरुआत बिरुड़ा पंचमी के दिन से हो जाती है यह पहला और महत्वपूर्ण दिन होता है इस दिन प्रत्येक घर में महिलाओं द्वारा सात प्रकार के अनाज जिस में
गेहूं,मक्का,गहत,चना जौ और लोबिया है जिन्हे ,तांबे या पीतल के बर्तन में भिगोया जाता है।
इस भीगे हुए अनाज को ही बिरुड़ा”कहा जाता है इन्हें मंदिर में रखा जाता है पर्व के दिन यानी की सप्तमी जिसे सातूँ कहा जाता है जिसमें बिरुड़ा को महिलाएं किसी स्वच्छ जल स्रोत के पास ले जाती हैं और भिगोए गये बिरुढ़ के पानी से स्नान करते हैं एवं लोकगीतों के साथ बिरुड़ों को धोतीं हैं। सप्तमी को (मां पार्वती) जिसे गमरा कहा जाता है …

गमरा को भादो माह में (मानसून ) होने वाले घास व अनाजों से बनाया जाता है सों, धान, बंसो, मंदिरा, झंयार घास, मक्का से गमरा को तैयार किया जाता है और उन्हें कुमाऊनी आभूषणों परिधान से सजाया जाता है एवं पवित्र स्थान पर रखा जाता है और पूजा की जाती है और भजन कीर्तन किया जाता है इसी प्रकार अगले दिन अष्टमी के दिन महिलाएं भगवान शिव जिन्हें महेश्वर की भी छवि बनाई जाती है

इन दोनों छवियों को एक साथ रखा जाता है इस दिन दोनों गमरा एवं महेश्वर की पूजा की जाती है एवं विरोध बिरुड का प्रसाद ग्रहण करते हैं. पर्व का समापन अष्टमी की शाम को किया जाता है जब गौरा एवं महेश्वर की छवियों को विदाई दी जाती है इस विदाई के साथ अगले वर्ष फिर से मिलने की उम्मीद के साथ पर्व का समापन किया जाता है. सातूँ-आंठू पर्व उत्तराखंड के लोगों के जीवन प्रकृति और उनकी आस्था का प्रतीक है जो वर्तमान में भी जीवित है.
पौराणिक कथा के अनुसार सातूँ आंठू पर्व भगवान शिव और देवी पार्वती की कथा में छिपी है, इस पर्व में देवी पार्वती को गौरा और भगवान् शिव को माहेश्वर के रूप में पूजा जाता है यह पर्व एक बेटी के अपने मायके आने और फिर पति के आठ वापस जाने की एक मार्मिक और आनंदमय कहानी है जोकि पहाड़ की परंपराओं और रिवाजों को खुद में समेटे है.


