( “टिकाऊ जीवन शैली की ओर उचित बदलाव” की थीम पर मनाया जाना था। विश्व उपभोक्ता दिवस,सस्ता, सुलभ ,व त्वरित न्याय के सिद्धांत पर बनाया अधिनियम, क्या उत्तराखंड में उद्देश्य से भटक नहीं गया, कोरम के अभाव में तीन दिन चल रही उपभोक्ता आयोग की बैठकें उद्देश्य की पूर्ति कर पायेंगी )

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम आज समाज के हितों के संरक्षण हेतु बहुत महत्वपूर्ण अधिनियम है। प्रत्येक व्यक्ति एक उपभोक्ता हैं, उत्पादन व सेवाओं का लाभ उठाता है। वर्ष १९८६ में बना अधिनियम जिसमें समय समय पर संशोधन हुये है। उपभोक्ता हितों के संरक्षण में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है।
इस वर्ष उपभोक्ता दिवस “टिकाऊ जीवन शैली की ओर उबचित बदलाव की “थीम पर मनाया जाना था, इस मौके पर अधिनियम के प्रचार प्रसार व जनता को जागरूक किये जाने के उद्देश्य से गोष्ठी, कानूनी जानकारी के पोस्टर आदि का वितरण होता आया था, पर उत्तराखंड में यह एक सपना बन कर रह गया।।”टिकाऊ जीवन शैली की ओर एक उचित बदलाव “बहुत ही गंभीर थीम है।
आधुनिक इंटरनेट के युग में उपभोक्ता को भी अपनी जीवन शैली में बदलाव लाना समय की आवाज और आवश्यकता है।जिसके लिए उपभोक्ता को जागरूक व शिक्षित होना आवश्यक है, ताकि अपने अधिकार के लिए सचेत रहें। विश्व उपभोक्ता दिवस,सस्ता, सुलभ ,व त्वरित न्याय के सिद्धांत पर बनाया अधिनियम है।
उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो,क्या उत्तराखंड में उद्देश्य से भटक नहीं गया, ?कोरम के अभाव में तीन दिन चल रही उपभोक्ता आयोग की बैठकें उद्देश्य की पूर्ति कर पायेंगी ? ये अपने आप में ज्वलंत प्रश्न है।
प्रदेश में स्थायी अध्यक्ष की जनपद में नियुक्ति न कर एक अध्यक्ष को तीन तीन जनपद का दायित्व दे काम चलाया जा रहा है। कैम्प जनपद में महिने में सिर्फ तीन दिन अध्यक्ष अदालत सुन रहे हैं ऐसे में क्या अधिनियम का ” त्वरित न्याय “का उद्देश्य धरातल पर उतर पायेगाजहां नब्बे दिन में शिकायत का निस्तारण हो जाना चाहिए।
वहीं जबाब दावा, परिवादी साक्ष्य, विपक्षी साक्ष्य लिखित बहस, बार बार नये मुद्दे पर बहस कर अंतरिम आदेश पारित कर मामले को पुनः जवाब दावे की स्थिति पर ला कर खड़ा कर देना , उद्देश्य को पूरा कर पायेगा?धरातल में देखने में आ रहा है, एक कार्यवाही में ही महिने गुजर जाते हैं, ऐसे में सस्ता सुलभ शीध्र न्याय का थीम एक दिखावा बन गया है।
तीन तीन प्रतियों में आयोग में अभिवचन, पेचीदा मुद्दा आयोग को सिविल न्यायालय की तर्ज पर चलाना क्या” वकील की कोई जरूरत नहीं” को विफल नहीं कर रहा।बहुत मुद्दे हैं, बहुत प्रश्न है यदि जिक्र किया जाय तो नकारात्मक आलेख बन जायेगा।
कहावत है “लड़ाई से चौकसी भली” इसी तर्ज पर इस वर्ष का थीम भी “टिकाऊ जीवन शैली की और एक उचित बदलाव” दिया गया है, उपभोक्ता,समाज यदि जागरूक होगा, शिक्षित होगा, अपनी उपभोक्ता उत्पाद खरीदने, और सेवा प्राप्त करने में शिक्षित व सचेत रहेगा तो विवाद नहीं होगा , जब विवाद नहीं तो परिवाद नहीं, “जब परिवाद नहीं तो अदालत नहीं ” का सुखद समाज होंगा।


