(दिलों को चीर के जो बात निकल जायेगी*फिर दूर तलक जायेगी। नीरज पंत)
साहित्यकारों की जानी-मानी संस्था छन्जर सभाअल्मोड़ा द्वारा मासिक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ विद्वान साहित्यकार,रंगकर्मी एवं संरक्षक त्रिभुवन गिरी महाराज द्वारा की गई, मुख्य अतिथि के रूप में वरिष्ठ विद्वान साहित्यकार एवं शिक्षाविद् सैयद अली हामिद जी प्रतिष्ठित रहे तथा संचालन वरिष्ठ साहित्यकार एवम् शिक्षाविद् नीरज पंत जी द्वारा किया गया।
काव्य गोष्ठी में अनेक कवियों ने काव्य पाठ किया।उपस्थित कवियों ने विकास,प्रकृति,श्रृंगार के संयोग,वियोगपक्ष,माँ,वर्तमान राजनीति,सामाजिक परिदृश्य सहित अन्य अनेकसमसामयिक विषयआधारितकाव्य,गीत,व्यंग,ग़ज़ल आदि विधाओं पर हिंदी व कुमाउनी में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं।.माँ सरस्वती को नमन व श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए काव्य गोष्ठी का पारंपरिक शुभारंभ किया गया। मुख्य अतिथि सैयद अली हामिद ने अपने सम्बोधन में सभी कोआंग्ल नव वर्ष की शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए वर्ष की प्रथम काव्य गोष्ठी में प्रस्तुत काव्य पाठ, गीत,गज़लों की साहित्यिक समीक्षा व प्रशंसा के साथ ही छंजर सभा को साहित्यिक रूप से सतत सृजनात्मक व और अधिक समृद्ध होने की अपेक्षा की,तत्पश्चात अपना काव्य पाठ किया। गोष्ठी के अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में त्रिभुवन गिरी महाराज ने उपस्थित जनों कोआंग्लनववर्षकीशुभकामनाएं, आशीर्वाद व साधुवाद देते हुए विविध विधाओं में प्रस्तुत सभी रचनाओं की समीक्षा व सराहना की,तत्पश्चात अपना काव्य पाठ किया। सभी को पुनः शुभकामनाएं प्रेषित करते हुए अध्यक्ष महोदय की अनुमति से संचालक नीरज पंत जी द्वारा काव्य गोष्ठी के समापन की औपचारिक घोषणा की गई।
👉काव्य गोष्ठी में उपस्थित कुछ प्रस्तुतियों /काव्यपाठ की झलक— (मुखड़ा पंक्तियाँ)
- चीर के जमीन में उम्मीद बोता हूँ
मै किसान हूँ मैं कहाँ सोता हूँ…..
. — मोहनलालगंज(मोहन टमटा) - मजबूत और सहनशील होना
उसका गुण बताया जाता है
कुछ इस तरह जीवन भर
गधेे को गधा बनाया जाता है…
— विपुल जोशी - नई साल ऐरो हर मर्जा के दवा ल्यारौ
सन् शयाण,बुढ बाड़ीन्हों वृद्धा आश्रम ल्यारौ…
— डी. एस. बोरा - दिलों को चीर के जो बात निकल जायेगी
बहुत मुमकिन है कि फिर लौट के न आयेगी
जो भी बोलो तो जरा सोच समझ कर बोलो
वरना ये बात तो फिर दूर तलक जायेगी…..
— नीरज पंत - वो मोबाइल हाथ में लिए देते रहते हैं शुभकामनाएं
शुभ प्रभात और शुभ रात्रि की
मगर क्या उन तक पहुंचती भी है उनकी ये शुभकामनाएं
जिनके घरों में इंतज़ार रहता है
पति और पुत्र के सकुशल घर लौट आने का……
— रमेश चंद्र लोहुमी - सुंदर प्यारा देश हमारा प्यारा हिंदुस्तान
जिसकी मिट्टी में बसता है वीरों का अभिमान…
— डॉ. धाराबल्लभ पांडे - कि कौहण बिकास हैरौ
गौं हमर उदास छन कि कौहण बिकास हैरौ….
— विपिन जोशी ‘कोमल’ - अमर है गया स्वतंत्रता सेनानी
स्वतंत्रता सेनानी अमर है गया
घर छोड़ी घरबार छोड़ी छोड़ दिया मै बापा हो
तुम जसा लाल भया मां भारती लाला हो….
— दिनेश चंद्र पांडे - धूप आने लगा रात में बांसते सियार फ्यून
रजाई लिहाफ में घुसे हुए आ गया ह्यून….
.— कंचन तिवारी - सांसों पे बोझ और बढ़े तो पता चले
कुछ देर को हवा न चले तो पता चले….
— सैयद अली हामिद - बसंत पंचमी लोक पर्व से मात्र एक दिवस पूर्व ही
माघ शुक्ल पक्ष के दुर्लभ पवित्र महात्म्य मास में अखंड सुहागिन सजीधजी आन शान से गई हो
सत्कर्मी पुण्यात्मा का प्रत्यक्ष प्रमाण हो तुम माँ
तुम्हें मेरा प्रणाम….!
— नीलम नेगी - देवभूमि वीर भूमि जन्म भूमि को प्रणाम
सप्त रंग संस्कृति मय उत्तराखंड को प्रणाम
उत्तराखंड है महान…..
— त्रिभुवन गिरी महाराज
(आख्या /रिपोर्ट प्रस्तुति/फोटो वीडियो संकलन हेतु — नीलम नेगी वरिष्ठ साहित्यकार का साभार)

















