( समीक्षक :-चेतना पाटनी वर्तमान शिक्षा प्रणाली पर कुछ प्रश्न करती पुस्तक बालमन की मनोवैज्ञानिक स्थित पर केंद्रित कर एक शोध है)
महेश चंद्र पुनेठा ने बाल मन पर केंद्रित कर “शिक्षा के सवाल” पुस्तक लिखी गयी है। इस पुस्तक की समीक्षा भी एक नवोदित साहित्यकार चेतना पाटनी ने की है, जिन्होंने गृह विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है। लेकिन उनकी रूचि साहित्य लेखन के प्रति अधिक है। चेतना पाटनी ने एक पाठक के रूप में पुस्तक की समीक्षा कर अपने विचार व्यक्त किए हैं। उन्होंने इस पुस्तक को प्रसिद्ध शिक्षाविद जान हाल के विचार से जोड़ते हुए अपनी कलम चलायी है।
चेतना का कहना है,प्रसिद्ध शिक्षाविद जॉन हाल कहते हैं कि जब कोई विद्यार्थी विद्यालय में पहला कदम रखता है, तो वह निडर, चतुर, आत्मविश्वासी, चीज़ों को समझने वाला, स्वतंत्र और धैर्यवान होता है। लेकिन विद्यालय का वातावरण धीरे-धीरे उसमें डर और आतंक पैदा कर देता है। यह वातावरण उसे उबाने लगता है और उसकी सोचने-समझने की क्षमताओं को कुंद कर देता है। इसी विषय वस्तु परमहेश चंद्र पुनेठा द्वारा लिखी “शिक्षा के सवाल” किताब शिक्षा व्यवस्था मे सृजनशीलता , रचनात्मकता को विकसित करने, प्रेरित करने के लिए लिखी गयी है जिसमे प्रत्येक बच्चे और शिक्षक को समान सहयोग करना होगा। शिक्षा में परिवर्तन के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए लेखक ने पुस्तक के प्रत्येक पाठ में विद्यालयी शिक्षा, विद्यार्थियों की कल्पनाशीलता, शिक्षक की भूमिका और कक्षा के वातावरण को रचनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत किया है।
शिक्षक को अधिक प्रभावशाली बनाने वाली यात्राओं, वैज्ञानिक चेतना के विकास के लिए प्रश्न उठाने की प्रवृत्ति और सीखने की प्रक्रिया को जीवंत बनाने के प्रयास इस पुस्तक को प्रभावशाली रूप में आकार देते हैं।कल्पनाओं की दुनिया में कई बार विद्यार्थी शिक्षक की एक डांट मात्र से सिहर उठते हैं। विद्यार्थियों की कल्पना में शिक्षक की छवि अक्सर डंडा लिए हुए गुस्सैल चेहरे के रूप में उभरती है। इस छवि का बदलना अत्यंत आवश्यक है। शिक्षा को प्रभावित करने वाले हर पहलू को पुस्तक में सामने लाने की भरपूर कोशिश की गई है चाहे वह सामाजिक मुद्दा हो, आर्थिक स्थिति हो या वर्ग भेद का प्रश्न।
पुस्तक यह भी स्पष्ट करती है कि एक शिक्षक मेंसंवेदनशीलता और सृजनशीलता कितनी जरूरी है तथा भाषा का प्रयोग किस प्रकार किया जानाचाहिए। शिक्षक का माध्यम और उसका शिक्षण-तरीका किस तरह शिक्षार्थियों को भय-मुक्त होकर शिक्षा ग्रहण करने में सहायता करता है, इसका संकेत पुस्तक के अंत में दिए गए डायरी के पन्नों से मिलता है।यह किताब समाज के हर उस वर्ग के विद्यार्थियों के प्रति सवाल खड़े करती है, जिनकी अनदेखी अक्सर होती रही है।
आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों से आने वाले विद्यार्थी भी मानसिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं, और निम्न वर्ग से आने वालों के सामने भी प्रताड़ना की वही समस्या मौजूद है। दोनों की मानसिक स्थिति पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है, भले ही उनकी आवश्यकताएँ अलग-अलग क्यों न हों।रचनात्मकता भीतर से लगभग मर चुकी है, क्योंकि काम और गृह-कार्य का बोझ किसी नए विचार को जन्म लेने ही नहीं देता। खेल अब आनंद का माध्यम न रहकर एक विषय बन चुका है। हर चीज़ को विषय बना दिया गया है और कार्य न करने पर दंड का भय दिखाया जाता है।विद्यालय व्यवस्था दो वर्गों में बंट चुकी है, सरकारी विद्यालय और निजी विद्यालय और यह तय किया जाता है कि कौन-सा विद्यालय किसे मिलेगा, वह उसकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है।
शिक्षा का उद्देश्य क्या सोचना है, इसके बजाय कैसे सोचना है, यह होना चाहिए। शिक्षा का लक्ष्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला और चरित्र निर्माण होना चाहिए। पुस्तक समीक्षा के साथ साथ चेतना पाटनी ने अपने को जोड़ते हुए कहा है हमें जॉन हाल की चेतावनी को गंभीरता से लेना चाहिए, जिसमें वे कहते हैं कि विद्यालय को आतंक का घर बनाने के बजायसंभावनाओं का केंद्र बनाना होगा। शिक्षित समाज वह नहीं है जो केवल डिग्रियाँ पैदा करता है, बल्कि वह है जो स्वतंत्र और मौलिक सोच को पनपने का अवसर देता है।डंडे के स्थान पर सहानुभूति को शिक्षक का आधार बनाना चाहिए। गलतियों को अपराध नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा माना जाना चाहिए। यही शिक्षा का मानवीय और भविष्यदर्शी स्वरूप है।

















