( प्रदेश मुख्यमंत्री, भाषा मंत्री और भाषा संस्थान के संयुक्त प्रयास से उन्नयन को गति मिल सकती है । रतन सिंह किरमोलिया)
उत्तराखंड राज्य कुमाऊं और गढ़वाल में विभाजित है। कुमाऊं में बोली जाने वाली लोक भाषा कुमाउनी कहलाती है और गढ़वाल में बोली जाने वाली लोक भाषा गढ़वाली कही जाती है। इन दोनों लोक भाषाओं की भी अपनी कई उपबोलियां प्रचलन में हैं।
हमारी लोक भाषाओं का इतिहास बहुत पुराना है। करीब नौवीं शताब्दी के शिलालेखों से जानकारी मिलती है कि ये लोक भाषाएं तत्कालीन राजाओं की राज भाषा भी रहीं। हमारी लोक भाषाएं इतनी पुरानी होने के बावजूद इनका न आज तक मानकीकरण हो सका। न एक सशक्त स्कूली पाठ्यक्रम ही बन पाया और न संविधान की आठवीं अनुसूची में ही शामिल करवाने के सार्थक प्रयास हो पाए।जब कि हमारी इन लोक भाषाओं की हर विधा में प्रचुर साहित्य उपलब्ध है और निरंतर उत्कृष्ट साहित्य सृजन हो रहा है। बावजूद इसके एक ठोस एवं सशक्त पहल न होने से हमारी लोक भाषाओं को राष्ट्रीय स्तर पर वो सम्मान नहीं मिल पा रहा है जिसकी ये भाषाएं हकदार हैं।
हमारे उत्तराखंड एवं उत्तराखंड से बाहर रह रहे रचनाकार निरंतर सृजनरत हैं। उत्कृष्ट साहित्य सृजन हो रहा है। हर विधा में पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं। साप्ताहिक एवं मासिक पत्र-पत्रिकाएं छप रही हैं।प्रचुर मात्रा में उत्कृष्ट साहित्य उपलब्ध है। डिजिटल मीडिया के माध्यम से भी पर्याप्त प्रयास हो रहे हैं। जिससे हमारी लोक भाषाओं का फलक राष्ट्रीय ही नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय मंच तक विस्तार पा रहा है। ये सारे प्रयास स्तुत्य हैं। परंतु ये सब व्यक्तिगत स्तर पर होने वाले प्रयास हैं। यहां तक कि उत्तराखंड एवं उत्तराखंड से बाहर हर बर्ष लोक भाषाओं के राष्ट्रीय भाषा सम्मेलन भी आयोजित किए जा रहे हैं।
उत्तराखंड सरकार ने ‘ उत्तराखंड भाषा संस्थान ‘ का गठन कर प्रसंशनीय कार्य किया है। भाषा संस्थान लोक भाषाओं के रचनाकारों को हर बर्ष पुस्तक प्रकाशन हेतु अनुदान भी दे रहा है और रचनाकारों को ‘ उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान ‘ जैसे सम्मान देकर सम्मानित भी कर रहा है। परंतु हमारी लोक भाषाओं के उन्नयन एवं समृद्ध विकास के लिए इससे आगे न उत्तराखंड भाषा संस्थान सोच पा रहा है और न हमारे प्रतिनिधि लेखक/ साहित्यकार ? देखने में आ रहा है कि पुस्तकीय अनुदान एवं साहित्य गौरव सम्मान प्राप्त करना साहित्य सृजन से अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं ? पुस्तकीय अनुदान भी पंद्रह लाख सालाना तक आय वाले रचनाकारों को दिया जा रहा है।
साहित्य गौरव सम्मान भी साल दर साल विवादों के घेरे में आ रहे हैं। शिकायत के बावजूद सुधार न होना भी संदेहास्पद ही नहीं अपितु सोचनीय है।विवादों से बचने के लिए उत्तराखंड भाषा संस्थान को अपनी कार्यप्रणाली में बदलाव की जरूरत है। पुरस्कारों के लिए आवेदन मांगे जाने के स्थान परसभीरचनाकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को प्रदर्शित करने वाली साहित्यकार गैलरी स्थापित करने की जरूरत है । पुरस्कारों के लिए चयन वहीं से किया जाए। चयन समिति में ऐसे लोक भाषाओं के वरिष्ठ प्रबुद्ध जानकार विद्वानों को शामिल किया जाए जो निष्पक्ष एवं ईमानदार हों। स्वयं भाषा संस्थान में लोक भाषाओं के अध्येता जानकार विद्वान अधिकारी कर्मचारी नियुक्त किए जाएं।
भाषा संस्थान रचनाकारों को पुस्तकीय अनुदान देने के बजाए संस्थान खुद प्रकाशन का दायित्व ले। प्रकाशित साहित्य एवं पत्र-पत्रिकाओं को देश प्रदेशों के पुस्तकालयों/वाचनालयों में बिक्री हेतु भेजा जाए। यह इसलिए कि हमारे लोक भाषा भाषी करीब करीब सभी राज्यों में कार्यरत हैं या निवास करते हैं। इससे प्रचार प्रसार में मदद मिलेगी। इससे प्राप्त होने वाली आय से एक कोष बनाया जाए। इस आय के कुछ अंश से रचनाकारों को रॉयल्टी दी जा सकती है। इस्कूल कालेजों में छात्रों के बीच समय-समय पर विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएं। इससे नई पीढ़ी अपनी भाषा संस्कृति से जुड़ पाएगी। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में लोक भाषाओं से संबंधित प्रश्न निर्धारित किए जाएं। यहां नियुक्ति पाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए यहां की लोक भाषाओं का जानकारी अनिवार्य की जाए। लोक भाषाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए जगह-जगह लोक भाषाओं में लिखे बोर्ड लगाए जाएं। इस्कूली पाठ्यक्रम निर्माण एवं संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करवाने के लिए भाषा का मानक रूप तय होना अनिवार्य है।
इसलिए इस पर सम्यक कार्यवाही आवश्यक है। यह कार्य बिना सरकारी सहयोग के नहीं हो सकता है। सरकारें इसके लिए विशेष संजीदा नजर नहीं आ रही हैं। इसके लिए हमारे विद्वानों को ही सम्मिलित प्रयास करने होंगे। सरकार के संज्ञान में इस बात को लाने के लिए दबाव बनाना आवश्यक है। इस काम के लिए ईमानदार जुझारू एवं निष्पक्ष विद्वानों का एक शिष्टमंडल बनाया जाना नितांत आवश्यक है। जो मुख्यमंत्री जी से बातचीत कर सके।इस बातचीत में भाषा संस्थान के निदेशक एवं भाषा मंत्री जी को भी शामिल करवाने का अनुरोध किया जाए।

















