उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में इन दिनों गैस सिलेंडरों की भारी किल्लत ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। इस संकट का सबसे गहरा असर होटल कारोबारियों और ढाबा संचालकों पर पड़ा है, लेकिन इस विपरीत परिस्थिति ने एक पुराने हुनर को फिर से जिंदा कर दिया है। कभी रसोई के कोने में धूल फांकने वाले और कबाड़ बन चुके ‘स्टोव’ अब फिर से आग उगलने लगे हैं।
गर्मपानी क्षेत्र के अनुभवी कारीगर रईस अहमद इन दिनों चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। रईस बताते हैं कि करीब 30-34 साल पहले वह स्टोव ठीक करने का ही काम करते थे। जैसे-जैसे एलपीजी गैस चूल्हों का चलन बढ़ा, स्टोव धीरे-धीरे रसोई से गायब हो गए और रईस का यह काम भी लगभग बंद हो गया। लेकिन दूरदर्शी रईस ने उस दौर के अपने औजारों और स्टोव के सामान को फेंकने के बजाय संभाल कर रखा।
रईस अहमद के अनुसार, बाजार में आए इस अचानक बदलाव ने स्टोव की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है। जो स्टोव पहले मात्र 400 से 500 रुपये में मिल जाते थे, आज उनकी मांग इतनी बढ़ गई है कि उनकी कीमत 4500 से 5000 रुपये तक पहुंच गई है। न केवल नया स्टोव, बल्कि इसके स्पेयर पार्ट्स और मरम्मत में लगने वाले सामान के दाम भी तीन गुना बढ़ चुके हैं।
आज जब गैस न होने के कारण होटल कारोबारी परेशान हैं, तो वे अपनी पुरानी मशीनों (स्टोव) को लेकर रईस के पास पहुंच रहे हैं। रईस कहते हैं, “काम में पहले जैसी तेजी तो नहीं रही, लेकिन खुशी इस बात की है कि बरसों पहले संभाल कर रखे गए औजार आज फिर से रोजगार का जरिया बन गए हैं।” जहां एक ओर आधुनिकता की दौड़ में पुराने संसाधन पीछे छूट गए थे, वहीं आज गैस संकट ने रईस जैसे कारीगरों के अनुभव को एक बार फिर सम्मान और काम दोनों दिलाया है। वर्तमान में क्षेत्र के कई लोग गैस के विकल्प के रूप में दोबारा स्टोव की ओर रुख कर रहे हैं।

















