(नीब करोली) हमेशा से आडंबर और दिखावे को नापसंद करते थे। उन्होंने हमेशा कहा कि राम राम जपो। हनुमान चालीसा और सुंदर काण्ड पाठ करो। उन्होंने हमेशा कहा कि हवन, यज्ञ, ध्यान से बढ़कर मानव सेवा, जीव सेवा है।
उन्होंने कभी कंबल, प्रसाद, चढ़ावे के लिए नहीं प्रोत्साहित किया। बडे़ धनवान लोगों ने जब बाबा महाराज को पैसा देने की पेशकश की तो उन्होंने फौरन मना कर दिया।बाबा महाराज तो प्यार के भूखे हैं। विदित है कि जितना धनवान, जितना रसूखदार, नामचीन आदमी बाबा महाराज के पास आता, बाबा महाराज उतना ही कम पसन्द करते। कई बार तो बाबा महाराज नामचीन हस्तियों से मिलने से भी इंकार कर देते।बाबा महाराज को सादगी पसन्द है।
आप ताम झाम में पड़ेंगे तो बाबा महाराज प्रसन्न नहीं होंगे। यह बाबा महाराज का संदेश है, स्वभाव है, शिक्षा है। इसे बाबा महाराज की कृपा और आज्ञा से मैं आप तक पहुंचा रहा हूं।
सही शिक्षा का पालन कर के ही कल्याण हो सकता है। जब तक हम कंबल, धागे, प्रसाद में फंसे रहेंगे, तब तक मोह, माया, अहंकार, राग द्वेष हमें उलझाता रहेगा। हमको ध्यान यह देना है कि हिंदू सनातन धर्म कथा, व्रत, जनेऊ, प्रसाद, जागरण और भंडारे का मोहताज नहीं है इसलिए इसी में उलझकर नहीं रहना है। सनातन धर्म विचार से है। विश्व कल्याण, विश्व बंधुत्व, जीव सेवा ही सनातन का विचार है। महादेव प्रसन्न होते हैं एक लोटे जल और एक बेलपत्र से। आडंबर ईश्वर को कभी प्रिय नहीं है।
यह भीतर तक समझना होगा। जिस क्षण आडंबर, प्रपंच खत्म होगा, उसी दिन ईश्वर का साक्षात्कार होगा, भक्ति फलित होगी। बाबा महाराज के वह भक्त, जो धनवान नहीं हैं, उनका एक दुःख यह है कि होटल, प्रसाद, पार्किंग का खर्चा बहुत है। लेकिन बाबा महाराज ने कब कहा है कि धाम आकर ही कृपा करूंगा।
आप अपने घर हैं तो वहीं बाबा महाराज की तस्वीर लगाकर, उनसे बात कर सकते हैं, उन्हें प्रेम कर सकते हैं। आप पर वहीं पर कृपा बरसेगी। रहस्य यह है कि बाबा महाराज को करुणा, प्रेम से भरा मनुष्य प्रिय है। आपके कर्म अच्छे हैं। आप सेवा कार्य में संलग्न हैं। आप कमाया धन परोपकार में खर्च करते हैं।
राम नाम लेते हैं। पराई बहन बेटियों को मां की नजर से देखते हैं। बड़ों का सम्मान करते हैं। मांस मदिरा सेवन नहीं करते तो बाबा महाराज आपको त्रिभुवन में ऐसा ऐश्वर्य, सूख, शान्ति, समृद्धि देंगे कि आप धन्य धन्य हो उठेंगे। कैंची धाम पिकनिक स्पॉट नहीं है और न ही पर्यटक स्थल है। यह तीर्थ है।
यहां आध्यात्मिक यात्रा के लिए आया जाता है। पूर्व में केदारनाथ धाम, बद्रीनाथ धाम इंसान अपने जीवन के ऐसे दौर में जाता था,जब सांसारिक जीवन समाप्त होने को होता था। या फिर वह लोग जो आध्यात्मिक ऊंचाई चाहते थे, वही तीर्थ यात्रा करते थे। हम सबसे बड़ी गलती यह कर रहे हैं कि तीर्थ स्थल पर कंफर्ट और लक्जरी चाह रहे हैं। तीर्थ स्थल के लिए त्याग और तपस्या चाहिए। आप यदि तीर्थ स्थल पर आकर फाइव स्टार होटल वाली लक्जरी खोज रहे हैं तो आप प्रकृति का नुकसान कर रहे हैं और तीर्थ का अपमान भी कर रहे हैं। बाबा महाराज की कृपा पाने के लिए न आपको महंगा प्रसाद चढ़ाना है और न वहां होटल लेकर रुकना है।
आपको महाराज की किताब और तस्वीर भी मंदिर के अंदर से खरीदने की ज़रूरत नहीं है। आप बाबा महाराज का संदेश समझें। गुरू आज्ञा का पालन करें। आप भूखे को भोजन कराएं। आपके आस पास कितने दीन,हीन, गरीब, बेघर, बुजुर्ग, अनाथ, विकलांग, मजदूर, वंचित लोग हैं, उनकी सेवा करें। यह बाबा की आज्ञा है। इससे बाबा की कृपा प्राप्त होगी, दुख दूर होंगे, मोक्ष मिलेगा, सब सुख मिलेगा। आप हनुमान चालीसा और सुन्दर काण्ड पाठ करें। आप राम नाम का जाप करें। सब कृपा इसी से है। आप जितना प्रसाद, कंबल, फोटो, किताब में फसेंगे, आपको टैक्सी, होटल, पार्किंग वाले उतना ही नोचेंगे। इसी तरह से दशकों और सदियों से हिंदू धर्म के भक्तों को नोंचा जा रहा है।
परमहंस, बुद्ध, महादेव, बाबा महाराज समझाते हुए थक गए लेकिन हम नहीं समझे। हम आज भी तिलक, प्रसाद, कथा और भगवा ध्वज में उलझे हैं। भावनाएं हमारी कितनी शुद्ध हैं, कितनी सेवा है, कितनी करुणा है, इसका कोई ज्ञान नहीं हमको। बाबा महाराज के पास कई लोग आते थे, जो चाहते थे कि बाबा महाराज कोई ऐसी पूजा, कोई ऐसा यज्ञ, अनुष्ठान करा दें, जिससे उनके सब दुख दूर हो जाएं। ऐसे लोगों से बाबा महाराज यही कहते कि दुःख भोगना जरूरी है। यह दुःख हमारे कर्मों के परिणाम हैं।
हमने पूर्व जन्म में जो पाप कर्म किए, उसी के परिणाम स्वरूप इस जन्म में दुख भोग रहे हैं। यदि राम राम, राधा राधा जपते हुए हम इन दुखों को भोग लेंगे तो आगे का जीवन आनंदित हो जाएगा और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा। यदि दुःख भोगने से बचना चाहेंगे तो आज नहीं कल, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में, दुःख तो भोगने ही होंगे। कर्मों के बंधन से किसी को मुक्ति नहीं है।
बाबा महाराज के इस प्रसंग से हमें यह सीखना चाहिए कि दुखों की मुक्ति रातों रात चमत्कार से नहीं हो सकती। कर्मों का फल तो भोगना होगा। कोई पूजा, कोई यज्ञ, अनुष्ठान पीड़ा नहीं दूर करेगा। सेवा,भक्ति, नाम जप आपको हिम्मत देगा। जब आप अपने दुखों को भोग लेंगे, तब गुरू और भगवत कृपा से आपका जीवन आनंदित हो जाएगा। एक बार बाबा महाराज द्वारा स्थापित हनुमान मंदिर में पूजा पाठ, यज्ञ और भंडारे का आयोजन किया गया। दोपहर होते ही हनुमान मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ जमा हो गई।
सभी प्रसाद का इंतजार करने लगे। जब बाबा महाराज ने भक्तों की भीड़ को इंतजार करते देखा तो मंदिर के व्यवस्थापकों से प्रसाद के बारे में पूछा। व्यवस्थापकों ने जवाब दिया कि हवन किया जा रहा है। उसके पश्चात भंडारा शुरु होगा। यह सुनते ही बाबा महाराज क्रोधित होकर बोले ” दुनिया में लोग भूख से मर रहे हैं और तुम हवन और स्वाहा स्वाहा में लगे हो। सब छोड़कर पहले भोजन कराओ। यही सबसे बड़ा धर्म है, भक्ति है, हवन है।
बाबा महाराज के प्रसंग से उन लोगों को सीखना चाहिए जो यूं ही कंठी माला पहन कर, तिलक लगाकर, मंदिर मंदिर जाते हैं मगर उनका आचरण, चरित्र ठीक नहीं है। जो अपने परिजनों की संपत्ति और धन हड़पना चाहते हैं, जो शराब, मांस का सेवन करते हैं, जो स्त्रियों को बुरी नजर से देखते हैं, जो गरीबों, पीड़ितों, असहाय लोगों को देखकर मुंह फेर लेते हैं, उन का विनाश निश्चित है। कोई पूजा पाठ, यज्ञ, अनुष्ठान उनके काम नहीं आएगा।
बाबा महाराज भक्तों से बहुत प्रेम करते हैं। जब भी भक्त कैंची धाम या अन्य किसी मंदिर में प्रवेश करते तो बाबा महाराज सुनिश्चित करते कि हर भक्त को भोजन मिले। बाबा महाराज दादा मुखर्जी से कहते कि सभी को दूध, चाय, पूड़ी, सब्जी उपलब्ध कराई। बाबा महाराज की सबसे बड़ी फिक्र यही रहती कि हर भक्त को भोजन मिले। बाबा महाराज की सबसे बड़ी आज्ञा ही यही है कि भूखों को भोजन उपलब्ध कराया जाए। हम सभी जो बाबा महाराज को अपना गुरु मानते हैं, उन्हें प्रयास करना चाहिए कि चाहे सप्ताह में एक दिन सही लेकिन थोड़ा भोजन पकाकर, अपने शहर, गांव के चौराहे, सिग्नल, बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन, मंदिरों के बाहर मौजूद गरीब, बेघर, बुजुर्ग, अनाथ, विकलांग, बच्चों को भोजन कराने का काम करें। कैंची धाम के स्थापना दिवस 15 जून और प्रयाग में कुंभ मेले के आयोजन के समय बाबा महाराज ने प्रकृति के महत्व को रेखांकित किया। बाबा महाराज ने मां शिप्रा और मां गंगा से पानी लेकर उसे घी बनाया और उससे भंडारे का प्रसाद बनाया गया।
बाबा महाराज ने भक्तों से कहा कि जितना पानी लेकर घी बनाया गया है, उतना ही घी मां शिप्रा और मां गंगा को अर्पित किया जाए। बाबा महाराज से जुड़े इस प्रसंग से समझा जा सकता है कि नदियां केवल जल स्त्रोत नहीं हैं। इसलिए मां शिप्रा और मां गंगा में प्रदूषण फैलाने से पहले सौ बार विचार होना चाहिए।
जिस तरह कुछ दिन पूर्व मां शिप्रा को गोवा का बीच समझकर फोटोशूट, खाना और शराब पीने का नीच कर्म हो रहा है, वह सनातन धर्म पर कलंक समान है। ऐसे लोगों का नाश होना निश्चित है। हम भक्तों को सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई अधर्मी मां शिप्रा की मर्यादा भंग न कर पाए। आप धर्म के लिए जब कदम उठाते हैं तो बाबा महाराज आपके साथ चलते हैं, आपको शक्ति देते हैं।
बाबा महाराज के परम भक्त रामदास, कृष्णा दास और अन्य विदेशी लोगों ने जब भी बाबा महाराज से ध्यान, क्रिया योग, कुंडलिनी जागरण के विषय में जानकारी प्राप्त करनी चाही तो बाबा महाराज ने सभी को हनुमान चालीसा पाठ करने, सुंदरकांड पाठ करने, राम राम जाप करने के लिए कहा। महाराज ने आजीवन सरल और सहज होने की सीख दी। जितना जटिल होंगे, जितने प्रपंच में फसेंगे, उतने उलझते जाएंगे। फिर न भक्ति होगी और न भगवान मिलेंगे।


