( काव्य गोष्ठी के माध्यम से होली का त्योहार मनाया)

फागुन रंगोत्सव में बिखरे भक्ति, प्रेम और लोकसंस्कृति के रंग
होली के पावन अवसर पर उत्तराखण्ड पर्वतीय रचनाकार मंच द्वारा “फागुन रंगोत्सव” शीर्षक से एक भव्य काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साहित्य प्रेमियों और रचनाकारों की उत्साहपूर्ण उपस्थिति रही। संपूर्ण वातावरण फागुनी उमंग, भक्ति रस और काव्य की मधुर धारा से सराबोर हो उठा।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि आदरणीया शोभा पाराशर जी रहीं। उन्होंने अपने उद्बोधन में होली के सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए साहित्य को समाज में प्रेम और सौहार्द का सेतु बताया।
कार्यक्रम का संचालन मंच के संरक्षक एवं अध्यक्ष आदरणीय आ. गिरीश त्रिपाठी ‘ओम’ जी द्वारा अत्यंत स्नेहपूर्ण और प्रभावशाली ढंग से किया गया। उन्होंने सभी रचनाकारों को क्रमवार आमंत्रित करते हुए आत्मीय शब्दों से कार्यक्रम को गरिमामय बनाए रखा।
उत्तराखंड की परंपरा का निर्वहन करते हुए कार्यक्रम का शुभारंभ गणेश वंदना से किया गया। उमा तिवारी जी ने “जय जय हो गिरिजा नंदन…” की भावपूर्ण प्रस्तुति दी। तत्पश्चात आशा बुटोला जी ने सरस्वती वंदना “हर पल करते तुम्हें नमन है मां…” के माध्यम से मां सरस्वती की आराधना कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
काव्य पाठ क्रम में विभिन्न रचनाकारों ने अपनी मनोहारी प्रस्तुतियाँ दीं—
हेमा जोशी ‘स्वाति’ जी ने “होली खेल रहे कन्हैया यमुना के तीर” से फागुनी छटा बिखेरी।
मुन्नी पांडे ने वृंदावन की कुंज गलियों की होली का सजीव चित्र प्रस्तुत किया।
आशा बुटोला ने श्याम संग होली खेलने की भावनाओं को स्वर दिया।
विनीता सामंत ने “भलौ भलौ जन्म लियो श्याम राधिका…” से भक्तिभाव जगाया।
उमा तिवारी ने “हरि धरे मुकुट खेले होली…” से सभी को भावविभोर किया।
ममता गुसाईं ने बसंती बयार की सुगंध से सजी रचना प्रस्तुत की।
योगेश गहतोड़ी ‘यश’ ने “शिव के मन माहि बसे काशी” के माध्यम से शिवभक्ति का भाव प्रकट किया।
ममता मासीवाल जी ने गई गई असुर तेरी नारी मंदोदरी सिया मिलन गई बागा में के माध्यम से बहुत सुंदर प्रस्तुति दी।
सुमन पांडेय जी ने करो कपोलन लाल मेरी बइया न पकड़ो,ये बइया मेरी जनक सुता की गाकर सबका मन हर लिया।
गिरीश त्रिपाठी ‘ओम’ जी ने कैसे रही सीता वन में अकेली कैसे रही एवं फागुन के विविध प्रसंगों को अपनी रचनाओं में सजीव किया।
मुख्य अतिथि शोभा पाराशर जी ने “राधे की चुनर भीग गई
जब श्याम ने मार दई पिचकारी…” की प्रस्तुति से होली के रंगों को साकार कर दिया।
अंत में हेमा आर्य ‘शिल्पी’ ने “काहे रंग डाले हैं बेरी सांवरिया…” से समापन को उल्लासपूर्ण बना दिया।
पूरे कार्यक्रम के दौरान श्रोताओं की तालियों की गूंज और रचनाकारों का उत्साह देखते ही बनता था। यह आयोजन केवल काव्य पाठ नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक परंपरा, भक्ति और लोकजीवन के रंगों का जीवंत उत्सव बन गया।
कार्यक्रम के अंत में संस्थापिका हेमा आर्य “शिल्पी” द्वारा मुख्य अतिथि महोदय एवं समस्त प्रतिभागी रचनाकारों का हृदय से आभार व्यक्त किया गया। धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का शुभ एवं गरिमामय समापन किया गया।





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