( सम्मानित होने के लिए साहित्यकारों से आवेदन पत्र आमंत्रित करना , साहित्यकार का अपमान करना है खुद आमंत्रित कर सम्मानित किया जाय)
उत्तराखंड के कुमाऊनी संस्कृति व साहित्य के धरोहर रतन सिंह किरमोलिया ने विभिन्न संस्थानों द्वारा साहित्य क्षेत्र से जुड़े साहित्यकारों व अन्य जन मानस को सम्मानित करने के चयन की प्रणाली में परिवर्तन करने की मांग उठायी है। रतन सिंह किरमोलिया ने एक बयान जारी कर कहा हमारे लिए विशेष हर्ष का विषय है कि उत्तराखंड सरकार ने यहां हिंदी एवं उत्तराखंडी लोक भाषाओं के उन्नयन हेतु ‘ उत्तराखंड भाषा संस्थान ‘ की स्थापना की है। लेकिन सरकार और भाषा संस्थान को कुछ सुधार और परिवर्तन की आवश्यकता है।रतन सिंह किरमोलिया का कहना है।
रचनाकारों की स्तरीय रचनाओं और पुस्तकों के प्रकाशन का दायित्व उत्तराखंड भाषा संस्थान अपने हाथ में ले और प्रकाशित पुस्तकों का बिक्रय देश प्रदेशों में यहां तक कि प्रवासी भारतीयों द्वारा विदेशों में स्थापित पुस्तकालयों/वाचनालयों में करवाया जाए। इससे संस्थान में कोष संचय हो सकता है। इस आय के कुछ अंश से रचनाकारों को रॉयल्टी भी दी जा सकती है।संस्थान में सभी रचनाकारों की एक वृहद गैलरी बनाई जाए। जहां उनका रचना संसार प्रदर्शित हो।
संस्थान अपने ही परिसर में एक वृहद पुस्तकालय स्थापित करे। जहां अन्य स्तरीय साहित्य के साथ साथ उत्तराखंड के रचनाकारों का प्रकाशित एवं अप्रकाशित साहित्य भी रखा जाए।संस्थान द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कारों के लिए रचनाकारों का चयन चयन समिति द्वारा इसी गैलरी/पुस्तकालय में रखे साहित्य में से किया जाए। इससे आवेदन करने की प्रथा खत्म होगी।
क्योंकि पुरस्कार/सम्मान के लिए आवेदन करना रचनाकार के स्वाभिमान एवं आत्मसम्मान के खिलाफ है।(चूंकि संस्थान रचनाकारों से आवेदन आमंत्रित करवाता है तो उन्हें मजबूरन आवेदन करना पड़ता है।)लोक भाषाओं के उन्नयन के लिए प्रदेश स्तर से लेकर जनपद एवं ब्लॉक स्तर तक समय समय पर विविध कार्यक्रम आयोजित करवाए जाएं। इन कार्यक्रमों के अंतर्गत स्कूली छात्र छात्राओं के लिए भी विविध कार्यक्रम आयोजित करवाए जाने की मांग उत्तराखंड भाषा संस्थान देहरादून से की है। उत्तराखंड राज्यकेग्राम-पोस्ट:अणां(गरुड़) बागेश्वर जनपद के साहित्यकार रत्न सिंह किरमोलिया का कहना है कि यदि उत्तराखंड सरकार व उत्तराखंड भाषा संस्थान देहरादून सुझावों पर गौर कर कुछ कार्य प्रणाली में परिवर्तन लाती है तो पुरूस्कार हेतु चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता आयेगी और साहित्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का मनोबल बढ़ेगा।

















