(*परंपरा-संस्कृति और भक्ति का अनूठा संगम बनी रामलीला,चार पीढ़ियों से चली आ रही रामलीला की विरासत को संजोने में जुटी समिति।
**आधुनिक तकनीक और भव्य मंचन के जरिए नई पीढ़ी को भगवान श्रीराम के आदर्शों से जोड़ने की अनूठी पहल की समिति ने।)


श्री भुवनेश्वर महादेव मंदिर एवं रामलीला समिति कर्नाटक खोला अल्मोड़ा में आयोजित रामलीला का तिलपात्र एवं हवन के धार्मिक अनुष्ठानों के साथ विधिवत समापन हो गया।वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना और धार्मिक रीति-रिवाजों के बीच संपन्न हुए अनुष्ठान के साथ रामलीला के इस वर्ष के आयोजन का समापन हुआ। कर्नाटक खोला की रामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं,बल्कि आस्था,संस्कृति, सामाजिक सहभागिता और पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को संरक्षित करने का एक सराहनीय उदाहरण बनकर सामने आई है।रामलीला के समापन के अवसर पर आयोजित तिलपात्र एवं हवन ने पूरे आयोजन को धार्मिक पूर्णता प्रदान की।भगवान श्रीराम के आदर्शों को आत्मसात करने और समाज में धर्म,सत्य, मर्यादा तथा सदाचार की भावना को मजबूत करने के संदेश के साथ रामलीला के आयोजन को विराम दिया गया।रामलीला के माध्यम से प्रस्तुत प्रसंगों ने श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि जीवन में परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों,सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अंततः विजय प्राप्त करता है।कर्नाटक खोला की रामलीला अल्मोड़ा की उन विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है जो धार्मिक आस्था को सामाजिक एकता के साथ जोड़ती हैं।रामलीला के दौरान भगवान श्रीराम के वनवास,भरत मिलाप,लंका विजय,रावण वध और अयोध्या वापसी जैसे प्रसंगों के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन चरित्र को मंच पर जीवंत किया गया।इन प्रसंगों में जहां अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश निहित रहा, वहीं पारिवारिक रिश्तों, भाईचारे, त्याग, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा जैसे मूल्यों को भी प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया।रामलीला भारतीय संस्कृति की ऐसी परंपरा है, जिसमें मनोरंजन के साथ-साथ समाज को नैतिक शिक्षा देने का महत्वपूर्ण उद्देश्य भी समाहित है।कर्नाटक खोला में इस परंपरा का निर्वहन जिस लगन और समर्पण के साथ किया जा रहा है, वह सराहना के योग्य है। बदलते समय में जब नई पीढ़ी का जुड़ाव पारंपरिक सांस्कृतिक आयोजनों से कम होने की चिंता व्यक्त की जाती है, ऐसे में रामलीला को भव्य, आकर्षक और तकनीकी रूप से बेहतर बनाने के प्रयास एक सकारात्मक संदेश देते हैं।श्री भुवनेश्वर महादेव मंदिर एवं रामलीला समिति कर्नाटक खोला की विशेषता यह है कि यहां रामलीला की परंपरा को केवल आयोजन तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसे पारिवारिक संस्कारों और सांस्कृतिक विरासत के रूप में आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। समिति के सभी रंगकर्मी लगातार रामलीला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने और भावी पीढ़ियों के लिए इसे आकर्षक बनाए रखने में जुटे हैं। समिति के बिट्टू कर्नाटक ने बताया उनके परिवार की चार पीढ़ियों का रामलीला से जुडाव कोई साधारण बात नहीं है।समिति के प्रयासों की सराहना इसलिए भी आवश्यक है कि कर्नाटक खोला की रामलीला इन सभी प्रयासों के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रही है।इस वर्ष रामलीला मंचन को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए समिति के संयोजक बिट्टू कर्नाटक की ओर से विशेष पहल की गई।
तिल पात्र व हवन में भारी संख्या में रंगकर्मी, रामलीला समिति के सदस्यों व कर्नाटक परिवार सहित जनमानस ने भाग लिया।

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