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बागेश्वर। जनपद के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वैभव के प्रतीक उत्तरायणी मेले 2026 की तैयारियों के बीच शिक्षा विभाग ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। स्थानीय जन प्रतिनिधियों की मांग और मेले के दौरान छात्र-छात्राओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से मुख्य शिक्षा अधिकारी (CEO) कार्यालय ने शीतकालीन अवकाश की तिथियों में संशोधन किया है। नए आदेश के तहत मेला क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्रीष्मकालीन विद्यालयों में अब शीतकालीन अवकाश 1 जनवरी के बजाय 12 जनवरी से शुरू होगा।
जन प्रतिनिधियों की मांग पर लिया गया निर्णय
हाल ही में उत्तरायणी मेले की तैयारियों को लेकर आयोजित एक उच्च स्तरीय बैठक में स्थानीय जन प्रतिनिधियों ने कपकोट और बागेश्वर ब्लॉक में मेले की भव्यता का मुद्दा उठाया था। उन्होंने मांग की थी कि मेले के दौरान स्कूलों का खुला रहना जरूरी है ताकि स्थानीय बच्चे मेले के सांस्कृतिक कार्यक्रमों और अन्य गतिविधियों का हिस्सा बन सकें। जन प्रतिनिधियों के सुझावों पर गंभीरता से विचार करते हुए शिक्षा विभाग ने उच्चाधिकारियों से अनुमति लेकर अवकाश कैलेंडर में यह आंशिक बदलाव किया है।
क्या है नया शेड्यूल?
शिक्षा विभाग के आधिकारिक कैलेंडर के अनुसार, जिले के स्कूलों को भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर दो श्रेणियों में बांटा गया है:

  • शीतकालीन विद्यालय (High Altitude): इन स्कूलों में शीतकालीन अवकाश 26 दिसंबर से 31 जनवरी तक निर्धारित है। ये विद्यालय वर्तमान में पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार बंद हो चुके हैं।
  • ग्रीष्मकालीन विद्यालय (Lower Altitude): सामान्यतः यहाँ अवकाश 1 जनवरी से 13 जनवरी तक होता है। लेकिन अब मेला क्षेत्र (बागेश्वर और कपकोट ब्लॉक) के इन स्कूलों में यह छुट्टियाँ 12 जनवरी से शुरू होंगी।

नोट: मेला क्षेत्र के बाहर स्थित अन्य सभी विद्यालयों में अवकाश पूर्व निर्धारित कैलेंडर के अनुसार ही लागू रहेंगे।

बीईओ को कड़ाई से अनुपालन के निर्देश
मुख्य शिक्षा अधिकारी बागेश्वर, विनय कुमार ने आदेश जारी करते हुए सभी खंड शिक्षा अधिकारियों (BEO) को निर्देशित किया है कि वे इस संशोधित कार्यक्रम का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि मेले के दौरान स्कूलों की सक्रियता से न केवल अनुशासन बना रहेगा, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण में भी मदद मिलेगी।
उत्तरायणी मेले का महत्व
बागेश्वर का उत्तरायणी मेला कुमाऊं मंडल का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और व्यापारिक आयोजन माना जाता है। सरयू और गोमती के संगम पर आयोजित होने वाले इस मेले का धार्मिक के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व भी है। 1921 में ‘कुली बेगार’ जैसी कुप्रथा का अंत भी इसी मेले के दौरान हुआ था। इस बार प्रशासन का लक्ष्य मेले को और अधिक भव्य बनाना है, जिसमें स्कूली बच्चों की रंगारंग प्रस्तुतियां मुख्य आकर्षण होंगी।

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