( व्यथा पेड़ों की, बेजुबान फूल कविता के माध्यम से बेजुबान को शब्द देती अनूठी कविता नीलम नेगी की)

नीलम नेगी

कविता प्रभा राष्ट्रीय साहित्य समूह नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित एवं देश भर से आये वरिष्ठ रचनाकारों की उपस्थिति में सुब्रतो पार्क नई दिल्ली में लोकार्पित डॉ.कविता सिंह प्रभा उमंग जौली सरीन व राजीव गौतम जी के संयुक्त संपादन में पर्यावरण संरक्षण ( पेड़, पौधे,पुष्प आदि) से जुड़े विषय विशेष पर आधारित व प्रकाशित साझा काव्य संग्रह ‘ वृक्ष चेतना के मौन स्वर’ में अल्मोड़ा (उत्तराखंड) की सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविद् नीलम नेगी की चयनित दो रचनाओं 1. ‘ व्यथा पेड़ों की ‘ व 2.’ बेजुबान फूल ‘ को संबंधित स्लोगन व लेखिका परिचय सहित स्थान दिया गया है।
नीलम नेगी उत्तराखंड की नही अपितु राष्ट्रीय स्तर की सशक्त साहित्यकार हैं। नीलम नेगी का लेखन निरंतर गतिमान है। जो गौरव का विषय है। नीलम नेगी अनेक राष्ट्रीय व प्रादेशिक संगठनों से जुड़ी है। उनके काव्य संकलन पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद, छंजर सभा, सहित अनेक साहित्यिक संस्थाओं व साहित्यकारों ने बधाई दी है। हिम शिखर परिवार भी नीलम नेगी को उपलब्धि पर हार्दिक बधाई देते हुए कविताओं को प्रस्तुत कर रहा है।

  • “व्यथा पेड़ों की”

जंगलों में लगी भीषण आग,
चारों तरफ धुंआ ही धुंआ
धधकते पहाड़,भयभीत वन्य जीव
मूक पशु पक्षी सब ख़ाक हैं….

तेजी से सूखते जाते जल स्त्रोत
देखकर ऐसा हाल मन बेहद दुःखी है
अब वन महकमा भी सोया है
या कोई और बात है…

चीख चीखकर कहते पेड़ सुनो व्यथा हमारी
जान है हममें भी,काटने पर दुःखता है
जलकर तड़फते फ़िर टूटकर गिरते हैं और
दर्द से खून के आंसू रोते हैं हम भी…

रे निर्मोही मानव अपने हाथों काट काटकर मुझे
छाया और मेरे अमोल उपहार फ़िर कहां पाओगे
बदलते मौसम,प्राकृतिक,मानवकृत आपदाओं से
प्रकृति के मौन संकेत को अब तक नहीं समझ पाये कि
पेड़ों को बर्बाद कर तुम बर्बादी से कैसे बच पाओगे…

आज कुछ इंसान तड़फ रहे चंद साँसों के लिए
कल पूरी कायनात तरसेगी ज़िंदगी के लिए क्योंकि
प्राणवायु देने वाले पेड़ तो निबट चुके होंगे और
साँसों की कालाबाज़ारी करने वाले भी
तुमसे मुँह फ़ेरकर किनारा कर जायेंगे…

सिर्फ खामोश खड़े वृक्ष,पादप ही नहीं
प्रकृति और मानव जीवन का आधार हैं हम
निर्जीव पेड़ नहीं हममें संगीत है जिसे सुन
हर्षित हो झूमते लहराते हैं
पोषण पा हरियाते और दुलार पा मुस्काते हैं हम…

पेड़ नहीं तुम्हारी संतान जैसे हैं हम भी
जो अच्छी परवरिश पा जीवन भर
अच्छा फल देते हैं गर छेड़ोगे तो तुम और
तुम्हारी भावी पीढ़ी साथ भोगेगी ये तय है…

कैसे आज हवा खरीद रहे हो भारी कीमत पर
अभी वक़्त है संभल जाओ वरना जो हाल मेरा आज है
यकीनन कल वही तुम्हारा होगा और
यकीन करो तुम्हारा कल मेरे आज से कहीं ज्यादा
भयावह और बेहद दुःखदायी होगा…

                     -- नीलम नेगी
                  अल्मोड़ा (उत्तराखंड)
  • ” बेजुबान फूल “

श्रद्धा और निष्ठा का भाव कोई इन फूलों से सीखे
जिन्हें बाग बहार और बागीचे से प्यार होता है
अपनी सुंदरता से प्रकृति में रंग भरने की चाहत लिए
सम्मान में झुकते हैं शाख के हर फूल क्योंकि उन्हें
अपने बागबान माली का कर्ज चुकाना होता है….

स्वार्थी इंसान तोड़कर फेंक दे राह में यूं ही चाहे
पर उसे तो किसी की चाहत में बाग सजाना होता है
फूल ही जानता टूटकर बिखर जाने का दर्द उसे तो
तितली भंवरे इंसान भगवान सबको निभाना होता है…

जानता है फूल आख़िर सूख जाना अंजाम है उसका
कुछ देर सही उसे माहौल को खुशनुमा बनाना होता है
संवर जाएं किसी दिल के एहसास खुशबू से उसकी
तोड़ दिये जाने पर भी खुशियों को महकाना होता है…

फूल न हों तो अर्चना अर्पण और समर्पण कैसे होते
बेबस हैं बेजुबाँ फूल उन्हें तो सबको हँसाना होता है
मौन अनुग्रह करता कोमल फूल हूँ दर्द मुझे भी होता है
टूट न जाएं शाख और तना जो असल बुनियाद है मेरी
जरा धीरे से खुद को तोड़ने की फरियाद करता है….

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