भारत का इतिहास अति गौरवशाली एवं समृद्धिशाली रहा है, वैज्ञानिक अध्यात्मवाद से हर कड़ी जिसकी जुड़ी हुई है जिसके समस्त व्रत और पर्व विज्ञान से जुड़े हुए हैं,खगोल में हो रही छोटी से छोटी घटनाओं का वातावरण में और इस शरीर में पड़ने वाले प्रभावों के आधार पर ही भारत के सभी व्रत, त्योहार का उल्लेख है कोई भी व्रत अकारण नहीं है उन्ही श्रैष्ठ काल खंड में से एक है चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन जिसे हम नवबर्ष के रूप में मनाते हैं,हजारों वर्षों का यह भारतीय इतिहास तथ्यों के आधार पर नवबर्ष को मनाता आ रहा है अब चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही नया वर्ष का प्रारंभ हो यह प्रश्न हो सकता है उत्तर यह है कि ब्रह्म पुराण मे’चैत्रे मासि जगद् ब्रह्या ससर्ज प्रथमेऽहनि ।
शुक्लपक्षे समग्रं तु तया सूर्योदये सति ।।’अर्थात् ब्रह्माजी ने चैत्रमास में शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय होने पर जगत् की सृष्टि की है।यह वाक्य उद्धृत किया है, जिससे यह विदित होता है सृष्टि का आरम्भ इसी दिन हुआ है, अतः इस तिथि को संवत्सरारम्भ का दिन कहते हैं। तदनु-सार ही यह नववर्ष है।किन्तु जहाँ तक हमने सोचा है, भारतवर्ष के लिए वसन्तारम्भ से ही वर्ष का आरम्भ माना जाना वैज्ञानिक प्रतीत होता है।
इसका एक कारण तो यह है कि बसन्तऋतु नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा प्रकृति के नव श्रृंङ्गार का आरम्भ-समय है। हम देखते है कि प्रत्येक वृक्ष-लता आदि इस समय अपने पुराने जीर्ण-शीर्ण पत्रादिकों को छोड़कर वर्ष भर के लिए पुनः नवीनता धारण करते हैं; इसलिए प्रकृति को नवीनता-प्रदान करने वाली इस ऋतु में वर्ष का आरम्भ माना जाये यह उचित ही है।
दूसरा कारण यह भी है कि सूर्य, निरयन पक्ष के अनुसार और सायन पक्ष के अनुसार भी, अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष पर इसी ऋतु में आता हैतीसरा और वैज्ञानिक कारण है कि 6 ऋतुएं भी शीत और उष्ण के विभाग से 3-3 के दो समूह में विभाजित होती है वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा और शरद हेमंत,शिशिर,। जिन्हें वेदों में अग्नि और सोम कहा गया है शीतलता मृत्यु का एवं उष्णता जीवन का स्वाभाविक लक्षण है।
ऋतुओं में उष्णता का आरंभ बसंत से ही होता है और चैत्र मास का शुक्ल पक्ष इसलिए कारण कि चन्द्रमा की गति तथा इसे औषधियों का राजा भी कहा जाता है नवरात्रि के नवदुर्गा के रूप में चन्द्रमा के गति के आधार पर औषधियों का भी वर्णन है विस्तार भय से इसे यहीं संक्षिप्त करते हैं प्रभु श्री राम का जन्म दिवस भी इसी कालखंड में पड़ता है तथा गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस समयावधि का बहुत ही मनोरम वर्णन किया है – जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल । – चर अरु अचर हर्षजुत – राम जनम सुखमूल ॥ योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि सभी अनुकूल हो गये। जड और चेतन सब हर्षसे भर गये। [क्योंकि] श्रीरामका जन्म सुखका मूल है ॥नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता ॥ मध्यदिवस अति सीत न घामा पावन काल लोक बिश्रामा ॥पवित्र चैत्रका महीना था, नवमी तिथि थी। शुक्लपक्ष और भगवान्का प्रिय अभिजित् मुहूर्त था।
दोपहरका समय था। न बहुत सरदी थी, न धूप (गरमी) थी। वह पवित्र समय सब लोकोंको शान्ति देनेवाला था ।इसी कारण सृष्टि का आरंभ या नवबर्ष इसी दिन शुरू होने का पूर्ण उदाहरण मिलता है भारतीय इतिहास की प्रमुख घटनाओं को अगर देखें जैसे राजा विक्रमादित्य और विक्रम संवत (57 ईसा पूर्व)विक्रम संवत की शुरुआत सम्राट विक्रमादित्य के शासनकाल से मानी जाती है, जिन्होंने शकों को हराकर उज्जैन में एक स्वर्णिम युग की शुरुआत की।इस संवत का पहला दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को आता है, जिसे नववर्ष के रूप में मनाया जाता है।भगवान राम का राज्याभिषेककई मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही हुआ था, जिससे यह दिन और भी महत्वपूर्ण हो गया।हाभारत और युधिष्ठिर संवमान्यता है कि महाराज युधिष्ठिर ने भी इसी दिन से एक नए संवत्सर की शुरुआत की थी।सृष्टि की रचना और ब्रह्मा जी का प्रथम दिनअगर ब्रह्मा के आयु की बात करे तो ज्योतिष गणना से 18 वर्ष यानी लगभग 19लाख वर्ष से भी ज्यादा आयु गणना निकलतीं है 2. शक संवत और राष्ट्रीय नववर्ष (78 ईस्वी)शक संवत सम्राट कनिष्क द्वारा प्रारंभशक सम्राट कनिष्क ने 78 ईस्वी में इस संवत को शुरू कियाभारत सरकार ने शक संवत को राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में मान्यता दी है।
चंद्रगुप्त मौर्य और नवरात्रि परंपरा-मौर्य काल में भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष के रूप में मनाने के प्रमाण मिलते हैं।आज का मूर्ख दिवस हमारा नवबर्ष अगर अंग्रेजों के ग्रीगोरियन कैलैंडर के हिसाब से देखें तो औसतन 1अप्रैल के आसपास पड़ता है सन 1582 ई में पोप ग्रेगरी (13 वें) ने जूलियन कैलेंडर को हटाकर ग्रीगोरियन कैलेंडर अपनाने की घोषणा की।नए कैलेंडर के अनुसार, नया साल 1 जनवरी से शुरू होना था, लेकिन कई लोगों को इस बदलाव की जानकारी देर से मिली या उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया और वे अब भी 1 अप्रैल को ही नववर्ष मनाते रहे।
ऐसे लोगों को “मूर्ख” समझकर उनका मज़ाक उड़ाया जाने लगा और तभी से 1 अप्रैल को “मूर्ख दिवस” के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई।कुछ लोग रोम की हिलारिया या फ्रांस का मछली पकड़ने के उत्सव को भी इससे जोड़ते हैं किन्तु सत्यता इसमें यह है।
कि15वीं सदी में अंग्रेजो का भारत आगमन हो चुका था और भारत की वैभवशाली ज्योतिष पंरपरा को देखकर उन्हें यह भान हुआ कि जब तक यह परंपरा उच्चतम शिखर पर है उनका शासन संभव नहीं है, उन्हें भारतीय परंपरा से चिढ़ थी और हर हाल में भारतीय परंपरा का इन्हें मजाक बनाने में आनंद आने लगा था और किसी के प्रतिरोध ना करने के कारण धीरे-धीरे यह अप्रैल फूल के रूप में परिणत हो गया आज पूरे भारत में हम लोग स्वयं ही इस गौरवशाली दिवस पर स्वयं को ही मूर्ख कहकर आनंदित होते हैं यह दुर्भाग्य है आइये अपनी गौरवशाली इतिहास एवं परंपरा की जड़ों की ओर लौटें तथा अपने बच्चों को सही जानकारी प्रदान करे।


