( जंगल की आग से रोकथाम और ईंधन का ईंधन)
गोविन्द बल्लभ पन्त राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, कोसी–कटारमल, अल्मोड़ा के ग्रामीण तकनीकी परिसर में दिनांक 29–30 दिसंबर 2025 को द हंस फाउंडेशन, देहरादून के सहयोग से वनाग्नि शमन एवं रोकथाम परियोजना के अंतर्गत दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस प्रशिक्षण में अल्मोड़ा एवं बागेश्वर जनपद के चार विकासखंडों—हवालबाग, ताकुला, गरुड़ एवं बागेश्वर—से चयनित 40 स्वयंसेवी अग्निशमन कर्मियों (टीओटी) ने प्रतिभाग किया। प्रशिक्षण का उद्देश्य चीड़ की सूखी पत्तियों (पिरूल) से बायो-ब्रिकेट तैयार कर वनाग्नि की समस्या को कम करने के साथ-साथ स्थानीय आजीविका के नए अवसर विकसित करना था।
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि गो. ब. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के निदेशक डॉ. आई. डी. भट्ट ने प्रशिक्षण का शुभारंभ किया। उन्होंने प्रतिभागियों को द हंस फाउंडेशन की परियोजना से जुड़ने पर शुभकामनाएँ दीं। अपने संबोधन में उन्होंने पिरूल से विभिन्न उत्पादों—जैसे जैव ईंधन, हस्तनिर्मित कागज एवं आकर्षक कलाकृतियाँ—तैयार करने हेतु संस्थान द्वारा विकसित तकनीकों की जानकारी दी तथा इन उत्पादों के विपणन के लिए मूल्य शृंखला विकास पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि इसके लिए सरकारी विभागों, शोध संस्थानों एवं गैर-सरकारी संगठनों के बीच समन्वय आवश्यक है।
इस अवसर पर ग्रामीण तकनीकी परिसर के प्रभारी डॉ. ललित गिरी ने प्रतिभागियों को बताया कि संस्थान द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के समुचित प्रबंधन के माध्यम से पर्वतीय क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों की आजीविका संवर्धन हेतु विभिन्न तकनीकों का विकास किया जा रहा है तथा हितधारकों की कार्यक्षमता वृद्धि के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।
द हंस फाउंडेशन के परियोजना प्रबंधक श्री नागेन्द्र तंगवान ने वनाग्नि शमन एवं रोकथाम परियोजना के अंतर्गत किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी और इस प्रशिक्षण से परियोजना क्षेत्र में होने वाले लाभों के बारे में प्रतिभागियों को अवगत कराया।
प्रशिक्षण के तकनीकी सत्र में श्री डी. एस. बिष्ट द्वारा पिरूल से बायो-ब्रिकेट (जैव ईंधन) तैयार करने का प्रयोगात्मक प्रशिक्षण दिया गया। दूसरे दिन डॉ. देवेंद्र चौहान एवं स्पर्धा संस्था के निदेशक ई. दीप चंद्र बिष्ट द्वारा पिरूल से हस्तनिर्मित कागज बनाने की तकनीकी एवं व्यावहारिक जानकारी दी गई तथा इससे भविष्य में रोजगार की संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला गया।
संस्थान के डॉ. रविंद्र जोशी ने चीड़ वनों की उपयोगिता एवं उनके पारिस्थितिक महत्व पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की। प्रशिक्षण के दौरान मुख्यमंत्री उद्यमशाला, हवालबाग के प्रबंधक श्री अरुण अधिकारी ने पिरूल आधारित उत्पादों—विशेषकर बायो-ब्रिकेट—को उद्यमिता से जोड़ने की संभावनाओं पर विस्तृत जानकारी दी। वहीं संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एस. सी. आर्य ने पिरूल से निर्मित विभिन्न उपयोगी उत्पादों की जानकारी देते हुए इनके माध्यम से नए रोजगार के अवसर सृजित होने की बात कही।
प्रशिक्षण के समापन सत्र में संस्थान के सूर्यकुंज में निदेशक महोदय द्वारा सभी प्रशिक्षार्थियों को प्रमाण पत्र प्रदान किए गए तथा प्रशिक्षण के दौरान अर्जित तकनीकी ज्ञान को अपने-अपने क्षेत्रों में प्रसारित करने का आह्वान किया गया।

















