भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा के वैज्ञानिकों द्वारा “खे़त बचाओ अभियान” के तहत ताड़ीखेत ब्लॉक के ग्राम नौगाँव, गड़स्यारी, सूरी, जाख तथा भिकियासैण ब्लॉक के ग्राम हरनौली में 100 से अधिक किसानों को सशक्त बनाया गया, जिनमें कुल 100 से अधिक किसानों की सक्रिय भागीदारी रही। संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कांत के कुशल मार्गदर्शन में आयोजित इन कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूक करना था।
ताड़ीखेत ब्लॉक के ग्राम नौगाँव में वैज्ञानिकों ने 27 किसानों (21 पुरुष, 6 महिला) के साथ बैठक आयोजित कर वैज्ञानिक एवं टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर विस्तृत चर्चा की। सूरी ग्राम में 10 किसानों (5 पुरुष, 5 महिला) ने भाग लिया और मृदा स्वास्थ्य एवं संतुलित पोषण प्रबंधन पर जानकारी प्राप्त की। गड़स्यारी ग्राम में अंधाधुंध रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक प्रयोग से हो रही मृदा‑स्वास्थ्य की हानि तथा उसके समाधान पर विशेष चर्चा हुई जिसमें आयोजित किसान गोष्ठी में 24 किसान (17 पुरुष, 7 महिला) शामिल हुए, जबकि जाख ग्राम में आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में 20 पुरुष किसानो ने भाग लिया, जहाँ मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन एवं संतुलित उर्वरक उपयोग पर व्यवहारिक जानकारी दी गई।
भिकियासैण क्षेत्र के हरनौली ग्राम में राज्य कृषि विभाग एवं संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें 41 किसान (21 पुरुष, 20 महिला) सहभागी रहे। कार्यक्रम में किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि, कृषि यंत्र पोर्टल, पीएम फसल बीमा योजना, तिलहन मिशन तथा अन्य विभागीय योजनाओं की जानकारी दी गई, जिससे वे उपलब्ध अनुदान एवं सुविधाओं का लाभ उठा सकें। उद्यानिकी क्षेत्र में कीवी मिशन, मधुमक्खी पालन योजना, उच्च घनत्व सेब उद्यान, संरक्षित खेती इत्यादि योजनाओं पर चर्चा कर किसानों को फसल विविधीकरण एवं आय संवर्धन के अवसरों से अवगत कराया गया।
सभी कार्यक्रमों में किसानों को मृदा परीक्षण की आवश्यकता, मृदा की पोषक तत्व स्थिति एवं पी.एच. के आधार पर फसल‑विशिष्ट उर्वरक सिफारिशों की महत्ता समझाई गई, जिससे अनावश्यक रासायनिक उपयोग में कमी एवं दीर्घकालिक मृदा‑उर्वरता की सुरक्षा संभव हो सके। नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश (एन.पी.के.) का संतुलित एवं अनुशंसित मात्रा में प्रयोग करने पर विशेष बल दिया गया ताकि पोषक‑तत्व उपयोग‑दक्षता बढ़े और मृदा‑अपक्षय में कमी आए।
किसानों को जैव‑उर्वरकों एवं जैव‑कीटनाशकों के उपयोग के लाभ बताए गए, जिनसे मृदा में सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ाकर पर्यावरण‑अनुकूल तरीके से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। बीज उपचार की तकनीकों, जैसे जैव‑एजेंटों एवं सुरक्षात्मक कोटिंग के माध्यम से अंकुरण में सुधार तथा बीज‑जनित रोगों की रोकथाम के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।
पर्वतीय कृषि की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए जैविक एवं प्राकृतिक खेती, जीवामृत‑बीजामृत का उपयोग, मल्चिंग, लाइन बोइंग एवं मिश्रित/मिश्रित खेती की पद्धतियों को अपनाने पर बल दिया गया, ताकि उत्पादन के साथ‑साथ मृदा‑स्वास्थ्य एवं पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित हो सके।
किसान गोष्ठियों के दौरान किसानों ने जंगली जानवरों (बंदर, जंगली सूअर) से फसल क्षति, सिंचाई सुविधाओं की कमी, उपज का उचित मूल्य न मिलना तथा गुणवत्तायुक्त बीजों की उपलब्धता जैसी समस्याएँ प्रमुख रूप से उठाईं। विशेषज्ञ वैज्ञानिकों द्वारा इन चुनौतियों पर वैज्ञानिक एवं प्रायोगिक सुझाव दिए गए और संसाधनों के बेहतर उपयोग तथा सरकारी योजनाओं के समन्वित लाभ के माध्यम से समाधान की दिशा सुझाई गई।
इन कार्यक्रमों का संचालन आईसीएआर–वीपीकेएएस, अल्मोड़ा के वैज्ञानिकों की विभिन्न टीमों द्वारा किया गया, जिनमें डॉ जय प्रकाश आदित्य, डॉ. सुशील कुमार, सुश्री अनुराधा भारतीया, डॉ. रवि शंकर एवं डॉ. प्रकाश घासल शामिल रहे।
















