
उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति और लोक परंपराओं में त्योहारों का एक खास महत्व है। सावन के महीने की शुरुआत होते ही पूरी देवभूमि ‘हरेला’ के रंग में रंग जाती है। यह त्योहार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह इंसान का प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का एक अनूठा जरिया है।
आइए जानते हैं कि उत्तराखंड का यह बेहद लोकप्रिय त्योहार क्यों मनाया जाता है, इसकी परंपरा क्या है और इसकी शुरुआत कब से हुई।

1. हरेला क्यों मनाया जाता है? (मुख्य कारण)
हरेला शब्द का सीधा अर्थ है—‘हरियाली का दिन’। इसे मनाने के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं:
- कृषि और अच्छी फसल की कामना: उत्तराखंड एक कृषि प्रधान पर्वतीय राज्य रहा है। मानसून के आगमन के साथ ही किसान नई फसल की बुआई करते हैं। इस दौरान आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से फसल की रक्षा करने और अच्छी पैदावार की कामना के लिए भगवान से प्रार्थना की जाती है।
- शिव-पार्वती विवाह का उत्सव: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के महीने में ही भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इस दिन कुमाऊं क्षेत्र में मिट्टी के सुंदर विग्रह (मूर्तियां) बनाए जाते हैं, जिन्हें ‘डिकारे’ कहा जाता है। इनकी पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगा जाता है।
2. कब से हुई इसकी शुरुआत?
हरेला पर्व की शुरुआत कब से हुई, इसका कोई सटीक लिखित इतिहास नहीं मिलता, लेकिन इसे सदियों पुराना वैदिक कालीन लोक पर्व माना जाता है।
इतिहासकारों और जानकारों के अनुसार, जब मध्य हिमालयी क्षेत्रों में मानव सभ्यता ने खेती करना शुरू किया, तभी से प्रकृति को धन्यवाद देने के लिए इस त्योहार की शुरुआत हुई। यह पर्व पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा और आज उत्तराखंड की पहचान बन चुका है।
3. कैसे मनाया जाता है यह पावन पर्व?
हरेला मनाने की प्रक्रिया त्योहार से ठीक 9 दिन पहले शुरू हो जाती है:
- हरेला बोना: त्योहार से 9 दिन पहले घर के मंदिर में छोटी टोकरियों (रिंगाल की टोकरी) में मिट्टी डालकर 5 या 7 प्रकार के अनाज (जैसे- गेहूं, जौ, मक्का, गहत, उड़द, सरसों) बोए जाते हैं। 9 दिनों तक इन्हें सूरज की रोशनी से दूर रखा जाता है, जिससे इनका रंग हल्का पीला-हरा हो जाता है।
- हरेला काटना और आशीर्वाद: सावन के पहले दिन (कर्क संक्रांति) को इस सुनहरी फसल को काटा जाता है। सबसे पहले इसे भगवान शिव और स्थानीय देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है। इसके बाद घर के बुजुर्ग अपने से छोटों के सिर और कानों पर हरेला रखकर उन्हें लंबी उम्र, समृद्धि और तरक्की का आशीर्वाद देते हैं। इस दौरान एक पारंपरिक गीत भी गाया जाता है:
“जी रया, जागी रया, यो दिन-बार भेटने रया…” (यानी जीते रहो, जागरूक रहो और यह दिन बार-बार देखने को मिले)।पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है ‘हरेला’
आज के आधुनिक दौर में हरेला सिर्फ त्योहार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘पौधारोपण अभियान’ का रूप ले चुका है। उत्तराखंड सरकार और स्थानीय लोग इस दिन बड़े पैमाने पर पौधे लगाते हैं। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि हमारा अस्तित्व प्रकृति से है, और इसकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।

















