गरमपानी। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जब पूरा देश तिरंगे के साथ वीर जवानों की शहादत को नमन करेगा, तब नैनीताल जिले के रातीघाट का एक परिवार अपने उस लाल को याद करेगा, जिसने महज 29 वर्ष की उम्र में देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। रातीघाट निवासी लांस नायक संजय बिष्ट 22 नवंबर 2023 को जम्मू-कश्मीर के राजौरी में ऑपरेशन रक्षक के दौरान आतंकवादियों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए थे। उनकी शहादत को करीब तीन वर्ष होने जा रहे हैं, लेकिन राज्य सरकार की ओर से शहीद परिवार से किए गए कुछ प्रमुख वादे आज भी अधूरे हैं।

संजय बिष्ट का सपना बचपन से ही सेना में भर्ती होकर देश की सेवा करने का था। परिवार के अनुसार, बचपन से ही सेना के जवानों के बीच रहने के कारण उनके मन में देशसेवा का जुनून पैदा हो गया था। भारतीय सेना उनके लिए महज नौकरी नहीं, बल्कि जिंदगी का सबसे बड़ा सपना थी। अपने इस सपने को पूरा करने के लिए संजय कड़ी मेहनत करते थे। वह सुबह करीब तीन बजे उठकर तैयारी करते और स्कूल से लौटने के बाद भी लगातार अभ्यास में जुटे रहते थे।

परिवार भी उनकी लगन और मेहनत को देखकर उन्हें सेना में भेजने के लिए पूरी तरह तैयार था। आखिरकार संजय ने सेना में भर्ती होकर अपने बचपन के सपने को साकार किया। सेवा के दौरान उन्होंने आतंकवाद विरोधी अभियानों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
परिजनों के अनुसार संजय बेहद जांबाज और जिम्मेदार जवान थे। उन्हें वीरता पदक हासिल करने का विशेष जुनून था। किसी महत्वपूर्ण मिशन में शामिल होने का मौका मिलने पर वह आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभाने से कभी पीछे नहीं हटते थे।

शहादत से कुछ दिन पहले 18 नवंबर को संजय ने अपने बड़े भाई नीरज बिष्ट से फोन पर बात की थी। उन्होंने बताया था कि उन्हें एक विशेष मिशन के लिए चुना गया है और यह उनके लिए किसी सपने के पूरा होने जैसा है। उन्होंने परिवार को भरोसा दिलाया था कि मिशन पूरा होने के बाद दोबारा बात करेंगे। परिवार के अनुसार, अभियान के दौरान उन्होंने आतंकवादियों के दस्ते के कई सदस्यों को मार गिराया था। 18 नवंबर की रात भी उन्होंने एक आतंकी को ढेर किया था।
इसके कुछ दिन बाद 22 नवंबर 2023 को जम्मू-कश्मीर के राजौरी में ऑपरेशन रक्षक के दौरान आतंकवादियों के साथ हुई मुठभेड़ में लांस नायक संजय बिष्ट शहीद हो गए। उनकी शहादत की खबर मिलते ही रातीघाट और आसपास के क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। परिवार के लिए यह उनके जीवन का सबसे बड़ा दुख था, वहीं पूरे क्षेत्र ने अपने वीर सपूत को श्रद्धांजलि दी।
देश के लिए उनके अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल से सम्मानित किया गया। संजय की शहादत के बाद क्षेत्र के युवाओं में सेना में भर्ती होकर देशसेवा करने का जुनून और बढ़ा। आज भी कई युवा उन्हें अपना आदर्श मानकर सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे हैं।
संजय जांबाज सैनिक होने के साथ ही बेहद मिलनसार और सरल स्वभाव के व्यक्ति भी थे। उन्हें खेती करना, बाइक चलाना और क्रिकेट खेलना काफी पसंद था। परिवार के साथ उनका गहरा लगाव था। मां और परिजन आज भी उनकी यादों के सहारे जीवन बिता रहे हैं।
परिवार का कहना है कि संजय की कमी हर पल महसूस होती है। उनकी याद को हमेशा जीवित रखने के लिए परिवार की ओर से हर वर्ष उनकी शहादत की तिथि पर अस्पताल में मरीजों को फल वितरित किए जाते हैं।
शहीद संजय बिष्ट के सम्मान में रातीघाट के राजकीय इंटर कॉलेज का नाम उनके नाम पर रखा गया है। इसके अलावा शहीद परिवार को मिलने वाली पेंशन का लाभ उनकी माता को मिल रहा है। हालांकि, शहादत के बाद राज्य सरकार की ओर से परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने और शहीद के नाम पर स्मारक बनाने की घोषणा की गई थी।
परिवार के अनुसार, करीब तीन वर्ष बीतने के बावजूद ये दोनों प्रमुख घोषणाएं अब तक पूरी नहीं हो सकी हैं। परिजन चाहते हैं कि सरकार जल्द से जल्द अपने वादे पूरे करे। उनका कहना है कि शहीद के नाम पर स्मारक बनने से आने वाली पीढ़ियों को संजय के बलिदान और देशसेवा से प्रेरणा मिलेगी। वहीं परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का वादा पूरा होने से सरकार की घोषणा भी सार्थक होगी।
स्वतंत्रता दिवस पर जब देशभर में वीर जवानों और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाएगी, तब लांस नायक संजय बिष्ट की कहानी देशभक्ति, साहस और बलिदान की मिसाल बनकर सामने आएगी। उन्होंने बचपन में सेना की वर्दी पहनने का सपना देखा, उसे पूरा किया और अंततः देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
अब उनके परिवार और क्षेत्रवासियों की उम्मीद सरकार से जुड़ी है कि शहीद से किए गए अधूरे वादे जल्द पूरे होंगे। रातीघाट में संजय बिष्ट के नाम पर प्रस्तावित स्मारक सिर्फ पत्थरों की एक इमारत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति, साहस और सर्वोच्च बलिदान की प्रेरणा बनेगा।

















