“आज से छह साल पहले जब हम हल्द्वानी से निकलते थे, तो मात्र तीन घंटे में अल्मोड़ा पहुंच जाते थे। कैंची धाम में सुकून से बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करते थे। लेकिन आज आलम यह है कि बाबा जी के दर्शन तो दूर, अपने ही घर जाने के लिए पूरा दिन सड़क पर बर्बाद हो रहा है।” यह दर्द किसी एक राहगीर का नहीं, बल्कि अल्मोड़ा-हल्द्वानी राष्ट्रीय राजमार्ग पर बसे स्थानीय निवासियों, व्यापारियों और टैक्सी चालकों का है, जो इन दिनों कैंची धाम में लगने वाले भीषण जाम से त्रस्त हैं।

​स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन का पूरा ध्यान केवल वीआईपी और बाहरी पर्यटकों की आवभगत पर है, जबकि स्थानीय जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि आपातकालीन स्थिति में किसी मरीज को हल्द्वानी रेफर करना हो, तो तीमारदार दस बार सोचने को मजबूर हैं। तगड़े जाम के कारण एम्बुलेंस घंटों फंसी रहती हैं, जिससे मरीज की जान पर बन आती है।

​यही हाल शादी के सीजन का भी है। हल्द्वानी जाने वाली बारातों को अब एक दिन पहले भेजना पड़ रहा है या फिर सुबह तड़के निकलना पड़ रहा है, ताकि शादी के शुभ मुहूर्त न छूट जाएं।

​इस जाम का सबसे दर्दनाक असर क्षेत्र के विद्यार्थियों पर पड़ रहा है। भवाली, गर्मपानी और खैरना से पढ़ने जाने वाले बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित हो चुकी है। हाल ही में जाम के कारण कई बच्चों की परीक्षाएं तक छूट गईं। शनिवार और रविवार को स्थिति इतनी विकराल हो जाती है कि बच्चों ने डर के मारे स्कूल जाना ही बंद कर दिया है। सुबह 7 बजे घर से निकलने के बावजूद बच्चे समय पर स्कूल नहीं पहुंच पा रहे हैं।

​स्थानीय जनता का सीधा सवाल है कि रात के समय मंदिर के किनारे हाईवे पर जो गाड़ियाँ पार्क हो जा रही हैं, उन पर प्रशासन सख्त कार्रवाई क्यों नहीं करता? क्या महज कुछ गाड़ियों का चालान काट देने से इतनी बड़ी समस्या का स्थायी समाधान संभव है? सड़क किनारे खड़ी ये गाड़ियाँ दिन के समय सड़क को और संकरा कर देती हैं, जो इस महाजाम का मुख्य कारण बनती हैं।

​जब मुख्य मार्ग पूरी तरह ठप हो जाता है, तो प्रशासन मजबूरी में टैक्सी वाहनों को रामगढ़ के लंबे रास्ते से अल्मोड़ा के लिए डायवर्ट कर देता है। रूट लंबा होने के कारण टैक्सी चालकों को मजबूरी में किराया बढ़ाना पड़ता है, जिससे वे यात्रियों की नजरों में बुरे बनते हैं।

पहाड़ का बड़ा सवाल: उन गरीब यात्रियों और विद्यार्थियों का क्या, जो अपने माता-पिता से बेहद मुश्किल से जेब खर्च लेकर सफर करते हैं? बढ़ा हुआ किराया उनकी जेब पर भारी पड़ रहा है।

​स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्रशासन को कई बार लिखित में शिकायतें दी जा चुकी हैं, लेकिन धरातल पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। आज ‘लोकल का आदमी’, इलाज के लिए तड़पता मरीज और पढ़ाई के लिए संघर्ष करता छात्र सरकार और प्रशासन से सीधे सवाल पूछ रहा है—आखिर कब तक हम इस अनियोजित पर्यटन और प्रशासनिक अनदेखी की कीमत अपनी जिंदगी बर्बाद करके चुकाते रहेंगे? क्या सरकार कभी इन बुनियादी मुद्दों पर बात करेगी या कोई स्थायी समाधान निकालेगी?

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