( AIIEA के पूर्व अध्यक्ष कामरेड अमानुल्लाह खान ने नयी श्रम संहिता पर खुल कर बात कही)

कामरेड अमानुल्ला खान जी को सम्मानित करते हुए BTFU के साथीगण

बरेली ट्रेड यूनियन फेडरेशन (BTUF) के द्वारा रोटरी भवन, बरेली में नई श्रम संहिताएं : मजदूर वर्ग पर हमला विषय पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया,जिसके प्रमुख वक्ता AIIEA के पूर्व अध्यक्ष कामरेड अमानुल्ला खान थे । प्रारंभिक वक्ताओं के बाद सेमिनार के संचालक साथी ने कामरेड अमानुल्ला खान को वक्तव्य देने के लिए आमंत्रित किया ।

*BTUF विचार गोष्ठी में कामरेड गीता शांत जी का उद्बोधन*

कामरेड अमानुल्ला खान ने अत्यंत सरल ढंग से लेबर कोड को समझाते हुए, श्रम कानून की जरूरत क्यों है, इस पर प्रकाश डाला । उन्होंने कहा कि मालिक और मजदूर का रिश्ता बराबरी का रिश्ता नहीं होता है । मजदूर हमेशा कमजोर पक्ष होता है, इसलिए उसको कानून के माध्यम से संरक्षण प्रदान किया जाता है , लेकिन आज उस संरक्षण को छीना जा रहा है । जो चार लेबर कोड सरकार ने बनाए हैं वह मजदूरों के अधिकारों को कमजोर करते हैं । सरकार कहती है की अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए ये लेबर कोड जरूरी हैं । वह यह भी कहती है कि देश में बेरोजगारी इसलिए है क्योंकि मालिकों के पास मजदूरों को निकालने का अधिकार नहीं है ।‌ सरकार की यह सोच पूरी तरह से मालिकों के पक्ष में है ।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप की अर्थव्यवस्था बर्बादी की हालत में थी उसको ठीक करने के लिए और मजदूरों के दशा सुधारने के लिए सरकार को भूमिका निभानी है, इसलिए सरकारी हस्तक्षेप और नियंत्रण को जरूरी माना गया, लेकिन 1970 के बाद तेल संकट और अरब इजरायल की जंग ने परिस्थितियों में परिवर्तन ला दिया, वाशिंगटन सहमति का निर्माण किया गया, जिसको अमेरिका में रोनाल्ड रीगन और इंग्लैंड में मारग्रेट थैचर ने निर्दयतापूर्वक लागू किया और मजदूर आंदोलन का दमन किया । थैचर का कहना था कि रोजगार पैदा करना सरकार का काम नहीं है, संपत्ति का वितरण बाजार अपने आप कर लेगा । भारत में भी 1991 से इसे लागू करने की शुरुआत हुई । दुनिया के श्रमिक वर्ग का यह दुर्भाग्य था कि इसी समय कम्युनिस्ट देश सोवियत संघ का विघटन हो गया और दुनिया एक-ध्रुवीय हो गई । जो नई विश्व व्यवस्था बनी उसके तहत दुनिया भर के मजदूरों के हकों पर कुठाराघात होना लाजिमी था

भारत में द्वितीय श्रम आयोग की स्थापना अटल बिहारी वाजपेई के प्रधानमंत्री काल में हुई । इन तथाकथित श्रम सुधारो की सिफारिश उस श्रम आयोग के द्वारा ही की गई थी । देश के मजदूर आंदोलन द्वारा किए गए पुरजोर विरोध के कारण लगभग दो दशक तक इनको लागू नहीं किया जा सका, परंतु अब सरकार उनको लागू करने में सफल हो गई है ।
कामरेड अमानुल्लाह खान ने इन चार श्रम संहिताओं को समझाते हुए क्रमवार इनके दुष्परिणाम सामने रखे ।‌

  1. औद्योगिक संबंध संहिता 2020
    यूनियन बनाना काफी मुश्किल होगा संस्थान में कार्यरत कुल कार्यबल का 10% यूनियन का गठन करने के लिए आवश्यक होंगे। बाहरी लोग यूनियन नहीं चला पाएंगे । यदि होंगे तो उनकी भूमिका काफी सीमित होगी । 300 से कम मजदूर होने पर छंटनी के लिए सरकार की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी।‌इस प्रावधान से देश के 90% से अधिक कारखाने और संस्थानों में छंटनी के लिए मलिक को अनुमति की मंजूरी की आवश्यकता नहीं रहेगी । मालिकों को जब चाहे नौकरी से निकालने का पूरा हक होगा । इससे मजदूर में असुरक्षा की भावना गहरी होगी एवं उनका शोषण आसान होगा । मैनेजमेंट से वार्ता के लिए कम से कम 51% मजदूरों का समर्थन जरूरी होगा । यदि नहीं है तो मैनेजमेंट एक नेगोशिएटिंग कमेटी बनाएगा । यूनियन चाहती है कि यूनियन की मान्यता कर्मचारियों के मध्य गुप्त मतदान से हो लेकिन इस विधि का कोई जिक्र इस श्रम संहिता में नहीं है ।
  2. वेतन संहिता 2019
    राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अनुसार ट्रेड यूनियन आंदोलन की मांग है कि गरिमा पूर्ण जीवन जीने के योग्य मजदूरी दी जाए और इस आधार पर मजदूरी तय की जाए। सरकार ने इनकार कर दिया। सरकार ने floor level मजदूरी 178 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से तय की है । कई राज्य सरकारों में न्यूनतम दैनिक मजदूरी इससे अधिक है जैसे केरल में ₹700 तमिलनाडु और कर्नाटक और अन्य कई राज्यों में ₹400 से लेकर ₹600 तक न्यूनतम दैनिक मजदूरी है । अब इन राज्य सरकारों पर न्यूनतम मजदूरी की दर कम करने का या और न बढ़ाने का दबाव होगा ।
  3. सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020
    सामाजिक सुरक्षा संहिता लागू करते समय गिग वर्कर्स की भलाई का बहुत बखान किया गया है, लेकिन सरकार ने तथाकथित श्रम सुधारो को लागू करते समय इनको वर्कर ही नहीं माना है बल्कि डिलीवरी पार्टनर कहा है और उनके कल्याण के लिए कोई फंड भी आवंटित नहीं किया गया है।‌सरकार ने आंगनबाड़ी, मिड डे मील वर्कर, आशा वर्कर आदि को स्कीम वर्कर माना है लेकिन वर्कर का दर्जा नहीं दिया है । सरकार इनको मानदेय देगी ना कि मजदूरी । ऐसी दशा में वर्कर को मिलने वाले लाभ या सामाजिक सुरक्षा उनको उपलब्ध नहीं होगी ।
    संस्थान में 10 वर्कर से कम होने पर ESI का लाभ नहीं मिलेगा और 20 वर्कर से कम होने पर पीएफ की सुविधा नहीं होगी ।
  4. व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य संहिता 2020
    कारखाने में कोई दुर्घटना होने पर मालिक की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी । हमारे सामने भोपाल गैस कांड का उदाहरण सामने है । अब तो परमाणु ऊर्जा क्षेत्र का भी निजीकरण किया जा चुका है । जरा सी चूक होने पर हजारों वर्करों और नागरिकों की जान जा सकती है और उनका जीवन पर्यंत उसके परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं । यह संहिता काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 घंटे तक करने की अनुमति देती है ।
    उपरोक्त चारों श्रम संहिताओं का एकमात्र उद्देश्य मजदूरों के संघर्षों को कमजोर करना है । देश के ट्रेड यूनियन आंदोलन ने इसका प्रखर विरोध किया है, लेकिन सरकार ने कोरोना काल में‌ अपने बहुमत का इस्तेमाल करते हुए विपक्षी सांसदों को सदन से बाहर निकाल कर बिना किसी चर्चा के इनको पारित कर लिया है और 57 करोड मजदूरों के भविष्य का फैसला दस मिनट में कर दिया गया ।

सरकार ने ट्रेड यूनियनों के साथ कोई चर्चा नहीं की। 2015 के बाद कोई श्रम सम्मेलन आयोजित नहीं किया, जबकि इससे पूर्व लगभग प्रतिवर्ष श्रम सम्मेलन आयोजित किया जाता था जिसमें श्रमिक संगठनों के साथ श्रमिकों के मुद्दों पर चर्चा की जाती थी
।
यह श्रम संहिताएं संविधान की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं। संविधान का अनुच्छेद 14 सबको समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद 19 संगठन बनाने की आजादी देता है, अनुच्छेद 21 गरिमा पूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है । इस प्रकार ये संहितायें भारत के संविधान को भी नजरंदाज करती हैं । भारत में व्याप्त असमानता पर जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार 50% जनता की मासिक आमदनी 8400 रूपये है । कोई नागरिक इतने कम आय में कैसे एक मानवीय जीवन जी सकता है ये श्रम संहितायें इस असमानता को संबोधित नहीं करती हैं । संविधान के नीति निर्देशक अध्याय में राज्य को असमानता कम करने का दायित्व सौंपा गया है, लेकिन यह श्रम संहितायें इस असमानता को और ज्यादा बढ़ाने वाली हैं ।

कॉमरेड अमानुल्लाह खान ने बताया कि ट्रेड यूनियन आंदोलन चुप नहीं है। हमने एक आंदोलन तैयार किया है । अभी हाल में ही में विश्व के कुछ प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने लंदन में एक बैठक की और एक वैकल्पिक दृष्टिकोण सामने रखा । उसके आधार पर हमने संविधान में संशोधन की मांग की है जिसके अनुसार स्वास्थ्य का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, रोजगार का अधिकार, भोजन की सुरक्षा का अधिकार और एक गैर अंशदाई सार्वभौमिक पेंशन का अधिकार मौलिक अधिकार बनाए जाएं । इसके जवाब में सरकार ने कहा इसके लिए पैसा नहीं है । हमने सुझाव दिया है कि देश के 1% सबसे अधिक धनी लोगों पर दो प्रतिशत की दर से संपत्ति कर लगाया जाए तथा उत्तराधिकार कर लगाया जाए तो आवश्यक धनराशि की व्यवस्था आसानी से हो जाएगी । तमाम विकसित देशों में उत्तराधिकार कर लागू है, लेकिन भारत में ऐसा कोई कर नहीं है । देश भर के ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं का यह दायित्व है कि इस मांग को जनता के बीच लेकर जाएं और एक व्यापक एकता का निर्माण करें लेकिन यह काम आसान नहीं है सरकार इसे आसानी से सफल नहीं होने देगी और धर्म के आधार पर, भाषा के आधार पर, क्षेत्र के आधार पर मजदूरों को बांटने की कोशिश करेगी इसलिए किसी भी विभाजनकारी एजेंडे को नकारते हुए, एक बड़ी एकता कायम करके ही इस लड़ाई को लड़ा जा सकता है ।‌ उन्होंने उम्मीद जाहिर की कि बरेली ट्रेड यूनियन फेडरेशन द्वारा आयोजित यह सेमिनार उस दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी ।
सेमिनार को BTUF के अध्यक्ष, महामंत्री साथी संजीव मेहरोत्रा, उपाध्यक्ष कामरेड गीता शांत एवं अन्य अनेक विभागों के कर्मचारी प्रतिनिधियों द्वारा भी संबोधित किया गया।
सेमिनार के अंत में एक Question -Answer Session भी था जिसमें विभिन्न प्रतिभागियों ने सवाल पूछे और कामरेड अमानुल्लाह खान ने उनके जवाब दिये ।

सेमिनार में लगभग 170 प्रतिभागी शामिल थे । कार्यक्रम के प्रारंभ और अंत में प्रगतिशील एकता मंच की ओर से क्रांतिकारी गीत भी प्रस्तुत किए गए ।‌ सेमिनार में NCZIEF के अध्यक्ष कामरेड संजीव‌ शर्मा एवं महामंत्री साथी राजीव निगम कोषाध्यक्ष साथी राकेश कनौजिया की गरिमामयी उपस्थिति रही । इसके अतिरिक्त कानपुर मण्डल के महामंत्री साथी मनोज जी, व संयुक्त मंत्री साथी चेतन जी एवं हल्द्वानी मण्डल के पांच साथी उपस्थित थे ।
बरेली ट्रेड यूनियन फेडरेशन द्वारा आयोजित यह सेमिनार अत्यंत सफल रहा । बीमा कर्मी संघ बरेली डिवीजन BTUF का संस्थापक एवं एक महत्वपूर्ण घटक है, अतः BTUF के साथ साथ BKSBD का नेतृत्व और सभी कार्यकर्ता इस सफल आयोजन के लिये बधाई के पात्र हैं । सेमिनार में मौजूद साथी सुख लाल, भगवान दास, मनोज गुप्ता, हरी सिंह सागर एवं दीवान सिंह आदि लोगों ने भागीदारी की।

ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad Ad