उत्तराखंड: देवभूमि के पहाड़ों में मकर संक्रांति, जिसे स्थानीय भाषा में ‘घुघुतिया’ के नाम से जाना जाता है, कभी केवल एक त्योहार नहीं बल्कि खुशियों का महापर्व हुआ करती थी। लेकिन आज आधुनिकता की चकाचौंध और पलायन की मार ने इस लोक पर्व की रौनक को केवल कहानियों तक सीमित कर दिया है।

​एक दौर था जब संक्रांति से कई दिन पहले ही घरों में चहल-पहल शुरू हो जाती थी। महिलाएं मिल-जुलकर आटे और गुड़ से ‘घुघुते’ और ‘खजूर’ बनाती थीं। बच्चों में इस बात की होड़ लगी रहती थी कि किसकी माला सबसे लंबी और सुंदर होगी। संक्रांति की सुबह, कड़कड़ाती ठंड में नदियों या नौलों में नहाना एक अनिवार्य परंपरा थी। इसके बाद गले में घुघुतों की माला डालकर छत पर जाना और “काले कौवा काले, घुघुति माला खा ले” की आवाज लगाना, पहाड़ों की फिजाओं में मिश्री घोल देता था।

​आज गांव के वो रास्ते सूने हैं। जहां कभी बच्चों की टोलियां अपने दोस्तों के साथ मालाओं की तुलना करती थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है। नई पीढ़ी के शहरों की ओर रुख करने से अब न तो वो सामूहिक उल्लास बचा है और न ही वो पारंपरिक पकवानों की खुशबू। महिलाएं अब पड़ोसियों के साथ मिलकर मालाएं नहीं पिरोतीं, बल्कि बाजार से रेडीमेड मिठाइयों से काम चलाया जा रहा है।

​इस लुप्त होती परंपरा का सबसे दुखद पहलू उन बुजुर्गों की आंखों में दिखता है, जो आज भी अपने बेटे, बहू और नाती-पोतों की राह तक रहे हैं। पहाड़ों के घरों की देहरी पर बैठे बुजुर्ग इस उम्मीद में रहते हैं कि शायद इस संक्रांति पर आंगन फिर से गुलजार होगा। उनके लिए यह त्योहार केवल एक तिथि नहीं, बल्कि अपने परिवार से मिलने का एक बहाना हुआ करता था। लेकिन अब अधिकतर घरों में केवल यादें और फोन पर दी जाने वाली औपचारिक बधाइयां रह गई हैं।

​मकर संक्रांति का यह पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ता था। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को इन कहानियों और रीति-रिवाजों से नहीं जोड़ेंगे, तो आने वाले समय में ‘घुघुतिया’ जैसे महान लोक पर्व केवल किताबों के पन्नों में ही जीवित रहेंगे। अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए जरूरी है कि हम त्योहारों के बहाने ही सही, अपनी मिट्टी की ओर वापस लौटें

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