​ईरान-इजराइल युद्ध के वैश्विक प्रभावों के बीच उत्तराखंड में एक अजीबोगरीब सियासी और प्रशासनिक बहस छिड़ गई है। प्रदेश के संसदीय कार्य एवं वन मंत्री सुबोध उनियाल ने राज्य में संभावित कमर्शियल गैस संकट से निपटने के लिए एक ‘नया फॉर्मूला’ पेश किया है। मंत्री का कहना है कि यदि युद्ध की वजह से कमर्शियल गैस सिलेंडर की किल्लत बढ़ती है, तो सरकार होटल और रेस्टोरेंट संचालकों को उनकी जरूरत के मुताबिक जलौनी लकड़ियां मुहैया कराएगी।

​मंत्री के इस बयान ने सोशल मीडिया से लेकर विधानसभा सदन तक हलचल पैदा कर दी है। एक तरफ जहाँ नेटिजन्स पीएनजी और सीएनजी के दौर में ‘चूल्हा युग’ की ओर लौटने की बात कहकर चटखारे ले रहे हैं, वहीं सदन में विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया:

  • ​नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने सवाल उठाया कि जब प्रदेश गैस संकट की ओर बढ़ रहा है, तो समाधान आधुनिक तकनीक के बजाय लकड़ियों में क्यों ढूंढा जा रहा है?
  • ​विधायक काजी निजामुद्दीन ने ‘डबल इंजन’ सरकार पर तंज कसते हुए पूछा कि क्या सरकार प्रदेश को पीछे ले जाने की तैयारी कर रही है?

​विपक्ष ने इस मुद्दे पर नियम 310 के तहत काम रोको प्रस्ताव लाकर चर्चा की मांग की, जिसे विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूड़ी ने तकनीकी आधार पर अस्वीकार कर दिया।

​विवाद बढ़ता देख संसदीय कार्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि वर्तमान में घरेलू रसोई गैस की कोई कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि फिलहाल उपलब्धता के आधार पर शैक्षणिक और स्वास्थ्य संस्थानों को प्राथमिकता पर कमर्शियल सिलेंडर दिए जा रहे हैं। यदि भविष्य में होटल-रेस्टोरेंट सेक्टर में ईंधन की गंभीर समस्या आती है, तो सरकार वैकल्पिक और ‘सकारात्मक’ समाधान के रूप में ईंधन की व्यवस्था करेगी।

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