गरमपानी । एक ओर जहाँ पहाड़ के ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की किल्लत गहराती जा रही है और लोग मीलों पैदल चलकर पानी लाने को मजबूर हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन और जल संस्थान की लापरवाही के कारण शुद्ध पेयजल सड़कों पर बहकर बर्बाद हो रहा है। गरमपानी क्षेत्र के पास मुख्य मार्ग पर पिछले कई दिनों से हो रहे जल रिसाव (वॉटर लीकेज) ने न केवल राहगीरों की मुसीबत बढ़ा दी है, बल्कि जल प्रबंधन के दावों की पोल भी खोल कर रख दी है।

घरों में सूखा, सड़कों पर सैलाब

​स्थानीय निवासियों का कहना है कि नलों में पानी का दबाव बेहद कम है और कई घरों तक तो पानी पहुँच ही नहीं पा रहा है। इसका मुख्य कारण पाइपलाइनों में होने वाला भारी लीकेज है। सड़क पर बहता यह पानी न केवल सरकारी संपत्ति और संसाधनों की बर्बादी है, बल्कि यह डामर की सड़क को भी धीरे-धीरे खोखला कर रहा है, जिससे भविष्य में बड़े हादसों का खतरा बना हुआ है। ‘जल ही जीवन है’ का नारा यहाँ केवल दीवारों तक ही सीमित नजर आता है।

नालियों में पानी नहीं, प्लास्टिक का अंबार

​सड़क के किनारे बनी नालियों की स्थिति और भी भयावह है। तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि जिन नालियों को जल निकासी के लिए बनाया गया था, वे अब कचरा पट्टी (डस्टबिन) में तब्दील हो चुकी हैं। प्लास्टिक की बोतलें, चिप्स के पैकेट और अन्य अजैविक कूड़े ने नालियों को पूरी तरह से चोक कर दिया है।

  • जमा हुआ कूड़ा और सड़ता पानी मच्छरों के पनपने का केंद्र बन गया है, जिससे संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।
  • ​सड़क पर जलभराव नालियां बंद होने के कारण बारिश या लीकेज का पानी सड़क पर ही जमा रहता है, जिससे वाहनों के फिसलने का डर बना रहता है।

प्रशासनिक मौन पर उठते सवाल

​हैरानी की बात यह है कि मुख्य मार्ग होने के बावजूद अधिकारियों की नजर इस ओर नहीं पड़ रही है। स्थानीय लोगों ने कई बार इसकी शिकायत की, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते लीकेज को ठीक नहीं किया गया और नालियों की सफाई नहीं हुई, तो उन्हें आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

पहाड़ों में जल संरक्षण आज की सबसे बड़ी जरूरत है। एक तरफ सरकार जल जीवन मिशन के तहत करोड़ों खर्च कर रही है, वहीं धरातल पर इस तरह की बर्बादी सिस्टम की विफलता को दर्शाती है। विभाग को चाहिए कि वह तुरंत इस लीकेज को ठीक करे।

ADVERTISEMENTS Ad