( जानें माने साहित्यकारों ने काव्य पाठ किया।
छन्जर सभा अल्मोड़ा के तत्वाधान में प्रत्येक माह के अंतिम शनिवार को आयोजित होने वाली काव्य गोषठी संपन्न हुई।कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री विनोद जोशी जी द्वारा की गई मुख्य अतिथि स्वरूप वरिष्ठ साहित्यकार,शिक्षाविद् डॉ.दिवा भट्ट जी प्रतिष्ठित रहीं।कार्यक्रम में वरिष्ठ/ सुप्रसिद्ध साहित्यकार /रगकर्मी एवं संरक्षक श्री त्रिभुवन गिरी महाराज जी,डॉ.धारा बल्लभ पांडे जी,कंचन कुमार तिवारी जी,डॉ.रमेश लोहुमी,डॉ.डी.एस.बोरा जी,ध्रुव टमटा ,भुवन चंद्र मिश्रा,सुनील चौहान,नीरज पंत,नीलम नेगी,मीनू जोशी ,पीयूष पंत सहित अन्य अनेक श्रोताओं ने कार्यक्रम को सादगीपूर्ण साहित्यिक भव्यता प्रदान की।संचालन लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार एवं सेवा निवृत प्रधानाचार्य नीरज पंत जी द्वारा किया गया। उपस्थित कवियों नेपहाड़,विकास,पीड़ा,प्रकृति,पर्यावरण,वर्तमान समय की राजनीति,श्रृंगार,राम भक्ति,बेटी,जन्मभूमि,सामाजिक परिदृश्य /चेतना सहित अन्य अनेक सम सामयिक विषय आधारित काव्य,गीत,व्यंग,मुक्तक,ग़ज़ल आदि अनेक विधाओं पर हिंदी व कुमाउनी भाषा में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कीं।संचालक नीरज पंत जी ने अध्यक्ष एवं मुख्य अतिथि को आसन ग्रहण करने के आग्रह के साथ मंचासीन अतिथि एवं सभी उपस्थित साहित्यकारों का औपचारिक स्वागत करते हुए कार्यक्रम की शुरुआत की। कंचन तिवारी द्वारा माँ सरस्वती को नमन वंदन करते हुए काव्य गोष्ठी का पारंपरिक शुभारंभ किया गया–
- मोरे कंठ स्वरों में विहरो मैं मूरख अज्ञानी
स्वर और ताल की दिया बाती मोरे कंठ बसो महारानी
सफल करो साधना मोरी स्वर साधना मोहे दीन जन जानी..* कार्यक्रम अध्यक्ष व मुख्य अतिथि द्वारा प्रस्तुत काव्य पाठों की संक्षिप्त किंतु सारगर्भित समीक्षा की गई।साथ ही काव्य गोष्ठी में प्रस्तुत उत्कृष्ट काव्यपाठ,ग़ज़लों व गीतों की प्रशंसा की।एक सुंदर काव्यमय संध्या आयोजन हेतु उपस्थित जनों का आभार व साधुवाद व्यक्त किया।सभी से छन्जर सभा में नियमित उपस्थिति के आह्वान के साथ छंजर सभा को साहित्यिक रूप से सतत सृजनात्मक व और अधिक समृद्ध होने की शुभकामनाएं व अपेक्षा के पश्चात अपना काव्य पाठ किया।सभी का पुनः आभार व धन्यवाद ज्ञापित करते हुए अध्यक्ष महोदय की अनुमति से संचालक नीरज पंत द्वारा काव्य गोष्ठी का औपचारिक समापन किया गया।
👉काव्य गोष्ठी में उपस्थित कुछ प्रस्तुतियों /काव्यपाठ की झलक— (मुखड़ा पंक्तियाँ)
- मरे हुए को क्या मारना, इतिहास सब गवाह है
रानी झांसी लड़ी अकेले वे सब तमाशबीन बने रहे…
— डॉ.दलीप सिंह बोरा - ख्वाब की दुनिया हकीकत की जमीं पर सजाई होगी
जिस मुसाफिर ने दश्त- ए- खार में जवानी गंवाई होगी..
— सुनील चौहान - सुंदर सुशील चिर यौवना सी
नव जीवन नव गृह प्रवेश हुई
नव वधु आज तुम
ज्ञान कौशल और व्यवहार विभूषित
उस घर की अच्छी शिक्षा और
सुसंस्कारों की माटी फूलों से अब
तुम इस घर की बगिया को महकाना..
— नीलम नेगी - इस वर्ष रावण इस हुन्कार के साथ यह कहकर चला गया
कि हाँ हाँ मैं जा रहा हूँ अगले वर्ष तक के लिए मगर खाओ कसम
कि तब तक कोई रावण नहीं दिखेगा यहाँ…
— डॉ. रमेश चंद्र लोहुमी - चाँद की नज़र जो पड़ी तुझ पे
तो दिल उसका भी धड़कने लगा
जो भी देखे तुझे जाने कैसा नशा
हर कोई बिन पिये ही बहकने लगा…
— नीरज पंत - बांज बुरुसी दयार और चीड़ लगौनो
भिड़ कनावा मोर पंखी पेड़ लगौनो…
— भुवन चंद्र मिश्रा - मुद्रिका हाय प्रभु जी की, मुद्रिका कहाँ से
कहाँ से तुम आई प्रभु जी को छोड़कर..
— डॉ. धारा बल्लभ पांडेय ‘आलोक’ - प्रेरणा एक शब्द कितना छोटा शायद परमाणु जितना
कितने लोग यहाँ देते हैं और कितने लोग यहाँ लेते हैं प्रेरणा..
— ध्रुव टमटा - और इस प्रकार एक एक करके सारे कबूतर उड़ गए
रह गई मात्र फड़फड़ाहट
फड़फड़ाहट दीवालों से बात करती है…
— डॉ. दिवा भट्ट - आस्था धार्मिक उन्माद नहीं
स्वयं को जानने की जिज्ञासा है
और..
निराकार अजेय व अगोचर को
साकार जेय व गोचर करने की
एक लंबी यात्रा है…
— मीनू जोशी - मनखा मनखै की पीड़ पछाणिये
एक हाड़ मासु ले की टोपी छू
यो धरती लै आकास कि छोपि छू
बीच पीड़ दया माया जाणिये
पराणि बरोबर जाणिये, मनखा….
— त्रिभुवन गिरी महाराज
( आभार,आलेख /रिपोर्ट प्रस्तुति/फोटो वीडियो संकलन हेतु नीलम नेगी का)






















