​मई और जून का महीना आते ही आज से कुछ साल पहले तक घरों में एक अलग ही हलचल शुरू हो जाया करती थी। स्कूलों में गर्मियों की लंबी छुट्टियां होना सिर्फ एक अवकाश नहीं, बल्कि एक उत्सव हुआ करता था। जो लोग शहरों में नौकरी-पेशा थे या बाहर रहकर पढ़ाई करते थे, उनके लिए यह अपने गांव, अपनी मिट्टी, और अपनी नानी-दादी के घर लौटने का सबसे खूबसूरत बहाना था। लेकिन आज वक्त के साथ वो अंदाज, वो परंपराएं और वो रौनक कहीं गायब हो गई है।

रोडवेज स्टेशन की वो भीड़ और सफर का रोमांच

​आज के दौर में भले ही लोग आरामदेह गाड़ियों और एसी ट्रेनों से सफर करना पसंद करते हैं, लेकिन पहले गर्मियों की छुट्टी के सफर की शुरुआत ही एक बड़े रोमांच से होती थी। लोगों में गांव पहुंचने की इतनी उत्सुकता होती थी कि वे सुबह होने से पहले, यानी तड़के 3:00 बजे ही रोडवेज स्टेशनों पर डेरा जमा लेते थे।

​बसों में भारी भीड़ हुआ करती थी, पैर रखने तक की जगह नहीं होती थी। एक ही रूट पर 4 से 5 बसें एक साथ चला करती थीं, फिर भी लोग जबरदस्ती बसों में ठसाठस बैठते और बैठाए जाते थे। खिड़की से रुमाल डालकर सीट रोकना और उस भीड़-भाड़ के सफर में भी बच्चों के चेहरों पर तैरती वो मासूम मुस्कान आज के डिजिटल युग में ढूंढना नामुमकिन है।

गांव का वो अपनत्व: मिठाई की मिठास और दूध-दही का स्वाद

​उस दौर में गांव की परंपराएं और आपसी जुड़ाव दिल छू लेने वाला होता था। जब कोई शहर से छुट्टी बिताने अपने गांव लौटता था, तो यह सिर्फ एक परिवार का मामला नहीं होता था। पूरे गांव में खुशियां मनाई जाती थीं। बाहर से आने वाला परिवार गांव भर में मिठाइयां बांटता था, तो बदले में गांव वाले भी उनके स्वागत में पलकें बिछा देते थे।

उन दिनों छुट्टी पर आए परिवार के लिए पड़ोसियों के घरों से खुद-ब-खुद शुद्ध दूध, गाढ़ा दही और ताजा मक्खन जैसी चीजें उनके घर पहुंचने लगती थीं। यह व्यापार नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम था।

​शाम होते ही गांवों का माहौल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रंग में रंग जाता था। देवताओं के ‘जागर’ लगते थे, विशेष पूजा-पाठ आयोजित होते थे, जिसमें पूरा गांव एक जगह इकट्ठा होता था।

मोबाइल के फेर में छूटे कबड्डी और बुजुर्गों के किस्से

​गांव पहुंचते ही बच्चे वहां के स्थानीय बच्चों के साथ एक हो जाते थे। वे आपस में अपने-अपने शहरों और स्कूलों की बातें साझा करते थे। दोपहर की चिलचिलाती धूप हो या सुहानी शाम, बच्चे घर के अंदर कैद रहने के बजाय मैदानों में क्रिकेट, कबड्डी और खो-खो जैसे पारंपरिक खेल खेला करते थे।

​रात को आंगन या छत पर बिछी चारपाइयों पर लेटकर बुजुर्गों से राजा-रानी, परियों और पुरानी लोक-कहानियां सुनना हर बच्चे का पसंदीदा शगल था। बुजुर्गों के पास अनुभवों का खजाना था और बच्चों के पास उन्हें सुनने की उत्सुकता।

​वक्त बदला, बदल गया बचपन: अब सिर्फ स्क्रीन का पहरा

​आज वक्त बदल चुका है और इस बदलाव ने हमारे बचपन के उस सुनहरे दौर को लील लिया है। अब न तो रोडवेज बसों में वो पुरानी रौनक और भागदौड़ दिखती है, और न ही गांवों में वो पुरानी परंपराएं बची हैं। अब बच्चे गर्मियों की छुट्टियों में बाहर धूल-मिट्टी में खेलने के बजाय सिर्फ और सिर्फ मोबाइल फोन में खोए रहते हैं।

​आज के बच्चों का बचपन रील्स, ऑनलाइन गेम्स और सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में सिमट कर रह गया है।

  • ​दिलचस्पी का अभाव: आज न तो बच्चों को दादा-दादी या नानी की पुरानी कहानियां सुनने में कोई दिलचस्पी रह गई है।
  • ​अभिभावकों की व्यस्तता: आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में आज के माता-पिता के पास भी इतना समय या धैर्य नहीं है कि वे अपने बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ सकें और उन्हें पुरानी कहानियां सुनाएं।

बदलाव प्रकृति का नियम है, लेकिन इस तकनीकी विकास की दौड़ में हमने जो खोया है, उसकी भरपाई कोई स्मार्टफोन नहीं कर सकता। जरूरत इस बात की है कि हम अपनी व्यस्त दिनचर्या से कुछ पल चुराकर नई पीढ़ी को उस पुराने अपनत्व, शारीरिक खेलों और बुजुर्गों के अनुभवों से दोबारा जोड़ें, ताकि ‘गर्मियों की छुट्टियां’ सिर्फ कैलेंडर की तारीखें न बनकर रह जाएं

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