विश्व प्रसिद्ध नीम करौली बाबा के आश्रम ‘कैंची धाम’ में उमड़ रही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ अब स्थानीय निवासियों और हल्द्वानी-अल्मोड़ा मार्ग पर सफर करने वाले आम यात्रियों के लिए बड़ी परेशानी बन चुकी है। कभी महज 3 घंटे में पूरा होने वाला हल्द्वानी से अल्मोड़ा का सफर अब 7 से 8 घंटों में तब्दील हो गया है। इस भयंकर अव्यवस्था के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर इस मुसीबत की जिम्मेदारी किसकी है—अपनी मजबूरी का रोना रो रहे टैक्सी चालकों की या फिर ट्रैफिक प्लान बनाने में नाकाम साबित हो रहे प्रशासन की?
लंबा रास्ता, दोगुना किराया: मजबूरी या अंधाधुंध लूट?
जाम से बचने के लिए टैक्सी चालकों को पहाड़ों के लंबे और कठिन वैकल्पिक रास्तों (जैसे भीमताल, रामगढ़ या मुक्तेश्वर मार्ग) का सहारा लेना पड़ रहा है। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के इस दौर में लंबा रास्ता तय करने के कारण किराए में आंशिक बढ़ोतरी तो जायज मानी जा सकती है, लेकिन इसकी आड़ में कुछ टैक्सी चालकों ने यात्रियों से सीधे दोगुना किराया वसूलना शुरू कर दिया है।
इस स्थिति में प्रादेशिक परिवहन कार्यालय (RTO) की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। क्या आरटीओ ने इन लंबे और डायवर्टेड रूटों के लिए कोई आधिकारिक किराया निर्धारित किया है? हकीकत यह है कि धरातल पर नियमों का कोई अता-पता नहीं है। यात्रियों का आरोप है कि सभी टैक्सी वालों के साथ समान व्यवहार नहीं हो रहा है। न तो हर रूट पर ईमानदारी से चेकिंग की जा रही है कि कौन कितना किराया ले रहा है, और न ही अवैध वसूली करने वालों पर कोई ठोस नकेल कसी जा रही है। अगर कोई परेशान यात्री टोल-फ्री नंबर या अधिकारियों से शिकायत दर्ज कराता भी है, तो उस पर तुरंत कोई कड़ी कार्रवाई नहीं होती, जिससे मनमानी करने वाले तत्वों के हौसले और बुलंद हैं।
गरमपानी बाजार ठप, स्थानीय व्यापारियों का कारोबार चौपट
कैंची धाम के इस अनियंत्रित जाम और प्रशासन के अव्यवस्थित रूट डायवर्जन का सबसे घातक असर स्थानीय व्यापार पर पड़ा है। गरमपानी बाजार से लेकर खैरना और आगे अल्मोड़ा, कौसानी, रानीखेत, चौकड़ी ,बागेश्वर, में पर्यटन के पूरे बाजार क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियां पूरी तरह ठप हो चुकी हैं।
व्यापारियों का कहना है कि जब गाड़ियां घंटों जाम में फंसी रहती हैं या उन्हें काफी पहले से ही दूसरे रास्तों पर मोड़ दिया जाता है, तो स्थानीय बाजारों तक ग्राहक पहुंच ही नहीं पाते।
छोटे दुकानदारों और होटल-रेस्टोरेंट स्वामियों का रोजगार पूरी तरह चौपट हो गया है, लेकिन ऐसा लगता है कि प्रशासन को स्थानीय लोगों के इस गंभीर आर्थिक नुकसान से कोई सरोकार नहीं है।
बाईपास रास्ता: यात्रियों की जान से खिलवाड़ या अस्थायी राहत?
यातायात को सुचारू करने के लिए सैनिटोरियम से रातीघाट तक के बाईपास और शिप्रा नदी पर बने नए वैली ब्रिज को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। लेकिन स्थानीय लोगों का पूछना है कि क्या यह बाईपास मार्ग पूरी तरह सुरक्षित है? सच्चाई यह है कि 15 जून के स्थापना दिवस मेले के दबाव को संभालने के लिए इसे आनन-फानन में खोल तो दिया गया, लेकिन इसका निर्माण कार्य अभी भी पूरी तरह मुकम्मल नहीं हुआ है। बिना पुख्ता सुरक्षा इंतजामों के इस कच्चे और खतरनाक रास्ते पर यात्रियों की गाड़ियां दौड़ाई जा रही हैं। क्या प्रशासन को लोगों की जान की कोई कीमत नहीं है? किसी भी दिन इस अधूरे बाईपास पर कोई बड़ा हादसा हो सकता है।
स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि अब आम पहाड़ी नागरिक हल्द्वानी जाने के नाम से ही कतराने लगा है। प्रशासन को इस गंभीर समस्या से कई बार अवगत कराया गया, लेकिन हर बार केवल कागजी ट्रैफिक प्लान ही देखने को मिलते हैं। जब तक आरटीओ मनमाने किराए पर सख्त कार्रवाई नहीं करेगा, पुलिस सड़कों पर अवैध पार्किंग करने वालों पर डंडा नहीं चलाएगी और प्रशासन एक पूर्णतः सुरक्षित व पक्का बाईपास तैयार नहीं करेगा, तब तक कैंची धाम का यह जाम आम जनता के लिए नासूर बना रहेगा।
















