समाज में कन्याओं की स्थिति पर मोती प्रसाद साहू ने अपनी लेखनी संस्कृत में चला कर हिन्दी में अनुवाद किया है। जिस पर एक नजर डालिये।
” अनुष्टुप -छंदा: “
रहसि रावणाद्भीता:
दुश्शासनात् चतुष्पथे।
तिष्ठनं गमनं चोभे
बालिकाभ्य: सुदुष्करम्।।1।।
कुर्वन्ति शोषणं ताषाम्
कार्यस्थले विधर्मिण:।
तै: रचितेन कुटेन
भवन्ति विवशा: च ता:।।2।।
कोशे संरक्षितं वित्तम्
आभूषणं तथैव च।
‘मतलोभे’ दुराचारी
कन्या कुत्र सुरक्षिता ।।3।।
मोती प्रसाद साहू
हिन्दी भावार्थ –
एकांत में रावण तथा सार्वजनिक स्थानों (चौराहों ) पर दुश्शासन जैसे प्रवृत्ति के लोगों से भयभीत लड़कियों के लिए बैठना तथा आवागमन करना कष्टकर हो गया है।1।
कार्य स्थल पर विधर्मी इन्हें अपने कपट जाल में फंसाकर दबाव बनाते हैं तथा अपने अनुसार चलने पर विवश कर देते हैं।2।
धन एवं आभूषण बैंक में सुरक्षित हैं। वोट बैंक के लालच में दुराचारी सुरक्षित हैं, किंतु कन्याएं आज कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। 3।

















