नगर पालिका व नगर निगम में 2002 और पंचायतों में 2009 की कट-ऑफ डेट को बताया असमान; हाईकोर्ट ने महाधिवक्ता को जारी किया नोटिस।

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य के नगर पालिका और नगर निगम क्षेत्रों में वर्ष 2002 के बाद दो से अधिक बच्चों वाले प्रत्याशियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने वाले कानूनी प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता एवं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में हुई। कोर्ट ने याचिका पर संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं, साथ ही महाधिवक्ता को भी नोटिस जारी किया है।

​यह याचिका ऊधम सिंह नगर जिले के किच्छा निवासी नईम उल की ओर से दायर की गई है। याचिका में ‘नगर पालिका व नगर निगम संशोधन एक्ट 2002’ के प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है।

​याचिका में उठाए गए मुख्य बिंदु:

  • दोहरे नियम का विरोध: याचिका में कहा गया है कि नगर निकायों में 2002 के बाद तीन बच्चे वाले प्रत्याशियों को चुनाव के लिए अयोग्य माना गया है, जबकि ग्राम पंचायतों में यही नियम 27 सितंबर 2009 के बाद से लागू किया गया है।
  • परिसीमन का प्रभाव: राज्य में हाल ही में हुए नगर निकाय परिसीमन के कारण कई ग्रामीण इलाके अब नगर पालिका या नगर निगम क्षेत्र में शामिल हो चुके हैं।
  • अधिकारों का हनन: जो लोग ग्रामीण क्षेत्र में होने के कारण 2009 के नियम के तहत चुनाव लड़ने के योग्य थे, वे परिसीमन के बाद अचानक अयोग्य घोषित हो गए हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि एक ही राज्य में दो अलग-अलग कट-ऑफ तिथियां लागू करना नागरिकों के साथ भेदभाव है और यह संविधान में दिए गए अधिकारों का उल्लंघन है।

​याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की है कि नगरीय निकायों में भी कट-ऑफ डेट को पंचायतों की तर्ज पर 27 सितंबर 2009 से लागू किया जाए या फिर इस प्रावधान पर रोक लगाई जाए, ताकि प्रभावित प्रत्याशी आगामी निकाय चुनावों में अपनी दावेदारी पेश कर सकें।

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