(आत्मबोध से आत्मज्ञान पर केन्द्रित तीन सत्रीय कार्यक्रम में समाज, साधना, साहित्य सृजन आदि महत्वपूर्ण विषयों पर साहित्यकारों ने विचार साझा किये)

राष्ट्र साधना के शताब्दी वर्ष पर 28 फरवरी २०२६ को अखिल भारतीय साहित्य परिषद के तत्वावधान में हल्द्वानी जनपद नैनीताल (उत्तराखंड) में आयोजित युवा सम्मेलन का आयोजन किया गया।यह सम्मेलन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि आत्मा से राष्ट्र तक की साधना का जीवंत उत्सव बनकर उभरा। “आत्मबोध से आत्मज्ञान” विषय पर केंद्रित इस त्रिसत्रीय विमर्श ने साहित्य, समाज और साधना के संबंध को गहराई से स्पर्श किया।
विषय की गंभीरता: आत्मबोध से आत्मज्ञान तक
सम्मेलन के तीनों सत्रों में आत्मबोध -अर्थात स्वयं की पहचान—से लेकर आत्मज्ञान—अर्थात व्यापक चेतना से एकत्व—तक की यात्रा पर गंभीर चिंतन हुआ। वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि साहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि आत्मा की जागृति का माध्यम है। जब लेखक स्वयं को पहचानता है, तभी वह समाज को दिशा देने में समर्थ होता है।

देश के प्रबुद्ध, ख्यातिलब्ध और पद्मश्री से सम्मानित साहित्यकारों तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत प्रचारक जी के सारगर्भित उद्बोधनों ने युवाओं को यह संदेश दिया कि राष्ट्र निर्माण का आधार वैचारिक स्पष्टता,सांस्कृतिआत्मविश्वास है।परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवन पुत्र बादल जी की उपस्थिति और मार्गदर्शन ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की। उनका उद्बोधन केवल प्रेरक नहीं, बल्कि दायित्वबोध जगाने वाला था। उन्होंने साहित्य को साधना बताते हुए कहा कि कलम तभी प्रभावी होती है, जब उसमें राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण हो।
इसी अवसर पर संगठनात्मक उत्तरदायित्वों की घोषणा भी हुई। जगदीश पंत ‘कुमुद’ को प्रांतीय अध्यक्ष, सौरव पांडे जी को प्रांतीय महामंत्री,श्रीमती पुष्प लता जोशी ‘पुष्पांजलि’ को उपाध्यक्ष,युवा कलमकार श्री कमलेश बुधला कोठी, प्रखर साथी मोहन पाठक जी, श्रीमती अंजू श्रीवास्तव,श्रीमती शशि देवली जी, उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी श्री भूपेन्द्र सिंह देव ताऊजी सहित अन्य साथियों को प्रांतीय दायित्व सौंपे गए।पूर्व अध्यक्ष श्री सुनील पाठक जी को राष्ट्रीय टीम में स्थान दिया जाना परिषद की निरंतरता और विश्वास का प्रतीक है।
युवा ऊर्जा और संवाद की परंपरा सम्मेलन का सबसे सशक्त पक्ष रहा—विभिन्न जनपदों और देश के कोने-कोने से आये प्रतिभागियों कायह संवाद बताता है कि साहित्य तब जीवंत होता है, जब वह संवादशील होता है।
विभिन्न क्षेत्रों में परिवर्तन लाने वाले युवाओं को सम्मानित करना,स्मृति-चिह्नों का वितरण केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि प्रेरणा का प्रतीक बन गया।

















