( सिखों के गुरु गोविंद सिंह के पुत्रों के बलिदान, परिवार के बलिदान के सप्ताह “इक्कीस दिसंबर से सत्ताईस दिसंबर ‘”के इतिहास को कौन याद दिलायेगा या फिर बलिदान का इतिहास भूला दिया जायेगा?)

सिर्फ भारत वर्ष का तीन सौ साल पुराना गुरु गोविन्द सिंह के परिवार के बलिदान के इतिहास का इक्कीस दिसंबर से सत्ताईस दिसंबर का इतिहास सप्ताह को कोई याद नहीं करता दिखाई देता एक वक्त था देश और समूचा पंजाब क्षेत्र शोक में रहता था, और जमीन में सोता था , चूंकि यह कोई साधारण बात नहीं है, इतिहास साक्षी है गुरु गोबिंद सिंह के दो छोटे बेटों, साहिबजादा ज़ोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह को सरहिंद के मुगल गवर्नर, वज़ीर खान ने धर्म परिवर्तन से इनकार करने पर 26 दिसंबर 1705 को जिंदा दीवार में चुनवाकर शहीद किया था, क्योंकि उन्होंने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया था; इस विश्वासघात में गंगू ब्राह्मण की भूमिका थी जिसने उन्हें पकड़वा दिया था।


वज़ीर खान,सरहिंद का मुगल गवर्नर, जिसने इन बच्चों को मौत की सजा दी।गंगू ब्राह्मण गुरु गोविंद सिंह परिवार का रसोइया था जिसने लालच में आकर इन्हें पकड़वा दिया। वज़ीर खान ने साहिबजादों से इस्लाम धर्म अपनाने को कहा, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। अपने धर्म और सिद्धांतों के प्रति उनकी अटूट निष्ठा के कारण उन्हें यह क्रूर सजा दी गई। गंगू ब्राह्मण, जो गुरु परिवार का सेवक था, ने माता गुजरी और छोटे साहिबजादों को पकड़वाकर वज़ीर खान के हवाले कर दिया।


वज़ीर खान ने उन्हें पहले एक बुर्ज में कैद किया, फिर धर्म बदलने के लिए दबाव डाला।
जब उन्होंने इनकार किया, तो उन्हें जिंदा दीवार में चुनवा दिया गया, और फिर तलवार से मार दिया गया।इस खबर से माता गुजरी ने भी सदमे से प्राण त्याग दिए।ये जो सप्ताह अभी चल रहा है (21 दिसम्बर से लेकर 27 दिसम्बर तक) इन्ही 7 दिनों में गुरु गोबिंद सिंह जी का पूरा परिवार शहीद हो गया था। 21 दिसम्बर को गुरू गोविंद सिंह द्वारा परिवार सहित आनंदपुर साहिब किला छोङने से लेकर 27 दिसम्बर तक के इतिहास को हम भूला बैठे हैं?एक ज़माना था जब यपंजाब में इस हफ्ते सब लोग ज़मीन पर सोते थे क्योंकि माता गूजर कौर ने वो रात दोनों छोटे साहिबजादों (जोरावर सिंह व फतेह सिंह) के साथ, नवाब वजीर खां की गिरफ्त में – सरहिन्द के किले में – ठंडी बुर्ज में गुजारी थी। यह सप्ताह सिख इतिहास में शोक का सप्ताह होता है।


गुरु गोबिंद सिंह जी की कुर्बानियों को देशवासियों सिर्फ 300 साल में भुला दिया?? इतिहास साक्षी है,जो कौमें अपना इतिहास – अपनी कुर्बानियाँ – भूल जाती हैं वो खुद इतिहास बन जाती है।आज हर भारतीय को विशेषतः युवाओं व बच्चों को इस जानकारी से अवगत कराना जरुरी है। हर भारतीय को क्रिसमस नही, हिन्दुस्थान के हिन्दू राजकुमारों को याद करना चाहिये। कुर्बानी के सप्ताह पर एक नजर डालते हैं

।21 दिसंबर:
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने परिवार सहित श्री आनंद पुर साहिब का किला छोड़ा।22 दिसंबर कोगुरु साहिब अपने दोनों बड़े पुत्रों सहित चमकौर के मैदान में पहुंचे और गुरु साहिब की माता और छोटे दोनों साहिबजादों को गंगू नामक ब्राह्मण जो कभी गुरु घर का रसोइया था उन्हें अपने साथ अपने घर ले आया।


चमकौर की जंग शुरू और दुश्मनों से जूझते हुए गुरु साहिब के बड़े साहिबजादे श्री अजीत सिंह उम्र महज 17 वर्ष और छोटे साहिबजादे श्री जुझार सिंह उम्र महज 14 वर्ष अपने 11 अन्य साथियों सहित मजहब और मुल्क की रक्षा के लिए वीरगति को प्राप्त हुए।23 दिसंबर को
गुरु साहिब की माता श्री गुजर कौर जी और दोनों छोटेसाहिबजादे स्वजाति बंधु के द्वारा गहने एवं अन्य सामान चोरी करने के उपरांत तीनों की मुखबरी मोरिंडा के चौधरी गनी खान से की और तीनो को गनी खान के हाथों ग्रिफ्तार करवा दिया और गुरु साहिब को अन्य साथियों की बात मानते हुए चमकौर छोड़ना पड़ा।24 दिसंबर कोतीनों को सरहिंद पहुंचाया गया और वहां ठंडे बुर्ज में नजरबंद किया गया।25 और 26 दिसंबर कोछोटे साहिबजादों को नवाब वजीर खान की अदालत में पेश किया गया और उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए लालच दिया गया।27 दिसंबर को
साहिबजादा जोरावर सिंह उम्र महज 8 वर्ष और साहिबजादा फतेह सिंह उम्र महज 6 वर्ष को तमाम जुल्म ओ जब्र उपरांत जिंदा दीवार में चीनने उपरांत जिबह (गला रेत) कर शहीद किया गया और खबर सुनते ही माता गुजर कौर ने अपने साँस त्याग दिए। इतिहास साक्षी है, धन्य हैं गुरु गोविन्द सिंह जी जिन्होंने धर्म रक्षार्थ अपने पुत्रो को शहीद किया था। धन्य हैं वह माता जिसने अजित सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतेह सिंह को जन्म दिया।धन्य है वे लाल जिन्होने अपनी भारत भूमि, अपने धर्म और अपने संस्कार की रक्षा हेतु माँ के दूध का कर्ज चुकाया और यौवन आने के पहले मृत्यु का वरण किया।चमकौर की गढ़ी का युद्ध: एक तरफ थे मधु मक्खी के छत्ते की तरह बिलबिलाते यवन आक्रांता और दूसरी तरफ थे मुट्ठी भर रण बाकुँरे सिक्ख – सिर पर केशरिया पगड़ी बाधें, हाथ मे लपलपाती भवानी तलवार लिये, सामने विशाल म्लेच्छ सेना और फिर भी बेखौफ!
दुष्टों को उनहोंने गाजर मूली की तरह काटा। वीर सपूत गुरुजी के दोनो साहबजादे – 17 साल के अजितसिंह और 14 साल के जुझार सिंह – हजारों हजार म्लेच्छो को मार कर शहीद हुये।

विश्व इतिहास में यह एक ऐसी अनोखी घटना है जिसमे पिता ने अपने तरूण सपूतो को धर्म वेदी पर शहीद कर दिया और विश्व इतिहास मे अपना नाम स्वणृक्षरो मे अंकित करवा दिया। क्या दुनिया के किसी और देश मे ऐसी मिसाल मिलती है?यवन शासक ने उन रण बांकुरों से उनके धर्म और संस्कृति के परिवर्तन की माँग की थी जिसको उन्होंने सिरे से खारिज कर दिया। गुरू महाराज के उन दो छोटे सिंह शावको ने अपना सर नही झुकाया। इस पर दुष्ट यवन बादशाह ने 7 साल के जोरावरसिंह और 5 साल के फतेह सिंह को जिंदा दीवाल मे चिनवा दिया।कितना बड़ा कलेजा रहा होगा वीर सपूतों का, कितनी गर्माहट और कितना जोश होगा उस वीर प्रसूता माँ के दूध मे – जो पाँच और सात साल के बच्चों की रगों मे रक्त बन कर बह रहा था – कि उनमे इतना जज्बा – इतना जोश – था कि अपने धर्म संस्कृति की रक्षा के लिये इतनी यातनादायक मृत्यु का वरण किया।और कितने दुष्ट, कितने नृशंस, कितने कातिल और कितने कायर थे वे म्लेच्छ जिनका मन फूल जैसे बच्चो को जिन्दा चिनवाते नही पसीजा था! और किस लिये? सिर्फ इसलिये कि मुसलमान बन जाओ! आखिर क्या अच्छाई हो सकती है ऐसे धर्म मे जो निरीह अबोध बच्चो को भी जिन्दा दीवार मे चिनवा दे?यही कारण है कि यह भूमि वीर प्रसूता और हम आज गुरू गोविंद सिंह और उनके साहबजादो को श्रृद्धा और विनम्रता से याद कर रहे हैं।हम मे से अधिसंख्य को इन वीरो के बलिदान की जानकारी भी नही होगी क्योकि हमने तो अकबर महान और शाहजहाँ का काल स्वण काल पढ़ा है; हमने तो इन वीर पुरुषो के विषय मे किसी किताब के कोने मे केवल दो लाइने भर पढ़ी होंगी।हमारा यह कर्तव्य है कि हम अपने बच्चो को इतिहास की यह जानकारी दें, यह जरुरी है कि हम अपने इतिहास और पुरखो के बारे मे जानें।
(साभार सोशियल मिडिया)

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