: इस्लाम में दो तरह की ईद मनाई जाती है — मीठी ईद ओर बकरीद। रमजान के रोजे रखने के बाद पड़ने वाली ईद मीठी ईद तो वहीं इस्लामिक कैलेंडर के आखिरी महीने ‘जुल-हिज्जा’ की 10 तारीख को बकरीद का पर्व मनाया जाता है। इसे इस्लाम में कुर्बानी के पर्व के रूप में मनाया जाता है। आज पूरे देश में ईद-उल-अजहा यानि बकरीद का पर्व मनाया जा रहा है। आइए इस पर्व से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं, जरूरी नियम और इसके आध्यात्मिक महत्व को जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के इस्लामिक स्टडीज के पूर्व प्रोफेसर अख्तरुल वासे द्वारा बताई गई 10 बड़ी बातों के जरिए समझने का प्रयास करते हैं। 

1. सबसे बड़े त्याग से जुड़ा है बकरीद का इतिहास

पैगंबर हज़रत इब्राहिम ने जब सपने में तीन बार अपने बेटे इस्माइल को अल्लाह की राह में कुर्बान करते हुए देखा तो उन्होंने यह बात अपने बेटे को बताई। तब इस्माइल ने बगैर किसी झिझक के कहा कि यह जीवन उसी अल्लाह के द्वारा​ दिया गया है, ऐसे में अगर वह इसे लेना चाहते हैं तो ले सकते हैं। इसके बाद जब हजरत इब्राहिम अपने बेटे को मक्के की वादी में ले जाकर उनको जबा करना चाहा तो खुदा को उनकी यह अदा इतनी पसंद आई की उन्होंने उनके बेटे की जगह एक एक दुंबा (मेमना या भेड़) को भेज दिया। इस तरह इस्माइल की कुर्बानी जानवर की सूरत में कुबूल हो गई। इसके बाद जानवर की कुर्बानी की परंपरा प्रारंभ हुई।

2. अल्लाह नेक नीयत का लेता है इम्तिहान प्रो. अख्तरूल के अनुसार बकरीद के मौके पर अल्लाह के लिए कुर्बान किए जाने वाले बकरे का गोश्त, खून और उसकी हड्डियां नहीं जाती हैं, बल्कि इंसान की नीयत और नेकी वहां जाती है। अल्लाह उसी के आधार पर भविष्य में फैसला करता है।

3. कुर्बानी के असल मायने क्या हैं’अजहा’ शब्द को अरबी भाषा में ‘कुर्बानी’ कहा जाता है, जिसका अर्थ सिर्फ किसी जानवर की बलि देना या फिर कहें कुर्बान करना भर नहीं होता है, बल्कि उसके साथ अपने अहंकार, बुराइयों और अपनी सबसे प्रिय चीज़ों को अल्लाह की रज़ा के लिए त्याग करना होता है।

4. कुर्बानी के नियम कुर्बानी किया जाने वाला जानवर किसी भी प्रकार की तकलीफ का शिकार नहीं होना चाहिए और न ही वह अंग—भंग या भैंगा होना चाहिए। बकरीद पर पूरी तरह से स्वस्थ बकरे या जानवर की बलि दी जाती है।

5. किनके लिए होता है कुर्बानी का गोश्त?बकरीद के मौके पर कुर्बान किए गये जानवर का गोश्त सिर्फ एक आदमी के लिए नहीं होता है। इसका एक हिस्सा स्वयं के लिए तो दूसरा अपने अजीज लोगों के लिए तो तीसरा हिस्सा गरीब तबके के लोगों के लिए होता है। गरीब तबके का अर्थ यह नहीं कि उसे कुछ भी दे दिया जाए, बल्कि उसे स्वयं और अपने अजीज व्यक्ति की तरह ही गोश्त देना होता है।

6. सभी के लिए अनिवार्य नहीं है कुर्बानी प्रो. वासे के अनुसार बकरीद पर कुर्बानी एक फर्ज है उनके लिए जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं। लोग अक्षम हैं या फिर कहें आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनके लिए बकरीद पर बकरे की बलि देना वाजिब नहीं है।

7.हज यात्रा का समापनइस्लामिक कैलेंडर के आखिरी महीने मनाई जाने वाली ईद-उल-अजहा या फिर कहें बकरीद वाले दिन ही दुनिया भर के मुसलमान अपनी ‘हज’ को पूरी करते हैं।

8. बकरीद की विशेष नमाज़प्रो. वासे के अनुसार बकरीद के दिन की नमाज उस अल्लाह के प्रति शुक्रिया का भाव होती है जिसने हमें ये दिन दिखाए कि उसकी रहमत के लिए हम शुक्र अदा कर सकें। बकरीद के दिन पढ़ी जाने वाली नमाज से न सिर्फ सवाब मिलता है बल्कि यह दिन उपर वाले के साथ स्वयं के रिश्ते को मजबूत करने का अवसर होता है। इस दिन पूरे मुल्क व दुनिया में अमन-चैन की दुआएं मांगी जाती हैं।

9.कुर्बानी की धार्मिक सीख बकरीद का पर्व यह सीख देता है कि जीवन में कितनी भी बड़ी परेशानी क्यों न आए हमारा विश्वास उस ऊपर वाले यानि अल्लाह पर कम नहीं होना चाहिए जो हमें दूसरों की मदद करने और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर लोगों की मदद करने की प्रेरणा देता है।

10. बकरीद का आध्यात्मिक संदेशबकरीद के पर्व का आध्यात्मिक संदेश है कि खुदा से ताल्लुक कायम करना और उसकी राह में अपने प्रिय जानवर को कुर्बान कर देना। बकरीद पर बांटे जाने वाले गोश्त के पीछे भाव यह है कि समाज में आपसी प्रेम और सद्भाव बना रहे और कोई भी भूखा न रहे।

ADVERTISEMENTS Ad