पहाड़। आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के बीच उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में आज भी कई ऐसी परंपराएं जीवित हैं, जो गांवों की सामाजिक एकजुटता और आपसी भाईचारे की पहचान रही हैं। गांवों में सामूहिक रूप से बैठकर भोजन करना और एक-दूसरे के काम में हाथ बंटाना इसी पुरानी परंपरा का हिस्सा है। इसका एक खूबसूरत उदाहरण सामने आए वीडियो में देखने को मिल रहा है, जहां लोग एक साथ बैठकर भोजन करते नजर आ रहे हैं।
पहाड़ों के गांवों में पहले किसी भी शुभ कार्य, धार्मिक आयोजन, पारिवारिक कार्यक्रम या सामूहिक भोज के दौरान पूरा गांव एक परिवार की तरह एकजुट हो जाता था। घर में कार्यक्रम भले ही किसी एक परिवार का होता था, लेकिन जिम्मेदारी पूरे गांव की मानी जाती थी। कोई भोजन बनाने में सहयोग करता था तो कोई लोगों को भोजन परोसने की जिम्मेदारी संभालता था। महिलाएं भी सामूहिक रूप से पकवान तैयार करने में जुट जाती थीं।
सबसे खास बात यह थी कि भोजन के समय अमीरी-गरीबी या छोटे-बड़े का भेद नजर नहीं आता था। लोग जमीन पर पंगत में एक साथ बैठकर भोजन करते थे। भोजन परोसने वाले लोग एक-एक व्यक्ति के पास जाकर खाना परोसते और यह सुनिश्चित करते कि किसी को किसी चीज की कमी न रहे। यही पंगत और सामूहिक भोजन पहाड़ की सामाजिक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
पहले गांवों में जब संसाधन सीमित थे, तब इसी सामूहिक व्यवस्था के कारण बड़े से बड़ा आयोजन आसानी से संपन्न हो जाता था। गांव का हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार सहयोग करता था। किसी के घर शादी हो, पूजा हो या कोई अन्य धार्मिक कार्यक्रम, पूरा गांव उस परिवार के सुख-दुख में सहभागी बनता था।
आज समय काफी बदल गया है। गांवों से पलायन बढ़ा है और पारंपरिक जीवनशैली भी धीरे-धीरे आधुनिकता की ओर बढ़ रही है। इसके बावजूद कई पहाड़ी गांवों में सामूहिकता और भाईचारे की यह भावना अब भी दिखाई देती है। ऐसे दृश्य नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़ने का काम करते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पहाड़ की असली पहचान सिर्फ यहां के खूबसूरत पहाड़, जंगल और नदियां नहीं, बल्कि यहां के लोगों का आपसी प्रेम, सहयोग और अपनापन भी है। सामूहिक भोजन जैसी परंपराएं इसी भावना को मजबूत करती हैं।
आज जब लोग अपनी व्यस्त जिंदगी में एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे में पहाड़ के गांवों की यह परंपरा समाज को एक साथ रहने और एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनने का संदेश देती है। जरूरत है कि ऐसी लोक परंपराओं को केवल यादों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक भी पहुंचाया जाए।

















