( राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस पर विशेष आलेख,
राज्य के सभी उपभोक्ताओं न्यायालय में अध्यक्ष,व सदस्यों के रिक्त पद यथाशीघ्र भरे जाने आवश्यक है वरनाशीध्र व सरल , सुलभ न्याय का सिद्धांत के आधार पर निर्मित उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम उद्देश्य से विफल हो जायेगा सफेद‌‌ हाथी बन शो पीस बन रह जायेंगे उपभोक्ता आयोग)

आज समूचा राष्ट्र “राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस “मना रहा है। वर्ष 1986में बने उपभोक्ता कानून को आज के दिन ही मंजूरी मिली। इसी वजह से चौबीस दिसंबर को ” राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस”मनाने का निर्णय लिया गया।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में जरूरत और वक्त की आवाज को देखते हुए समय‌ समय पर संशोधन भी हुये।उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के उद्देश्य और पृष्ठभूमि में जाया जाय तो यह अधिनियम दीवानी न्यायलयों की जटिलता से हट सरल व साधारण तरीके से उपभोक्ता हितों के संरक्षण हेतु “न वकील न दलील ” के सिद्धांत पर सस्ता, सरल‌, सुलभ न्याय का अधिनियम था।

न्यायालय की संरचना से हट ,दो सदस्य एक अध्यक्ष की संरचना काअर्ध न्यायिक प्रक्रिया का मंच था, जिसकी संरचना जिला स्तर पर जिला आयोग, राज्य स्तर पर राज्य आयोग राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आयोग तथा सर्वोच्च अदालत सर्वोच्च न्यायालय है।
सस्ता, सरल और शीघ्र न्याय के उद्देश्य को लेकर बना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम कानूनी दांव पेंच में उलझता नजर‌आ रहा है।

सस्ता न्याय की बात की जाय तो सामान्यतः तीन तीन‌ प्रतियों में आयोग के दस्तावेज फिर जितने‌ प्रतिवादी उतनी और प्रतियां सस्ते न्याय की अवधारणा से हट रहा है। त्वरित न्याय की बात की जाय तो जिला आयोग के परिप्रेक्ष्य में कुछ वर्ष पहले तक स्थायी सदस्यों की नियुक्ति नहीं हुई,साथ ही अध्यक्ष का दायित्व भी पदेन जिलाजज को दिया गया ।

देखा गया इन व्यवस्थाओं के चलते न्याय दिलाने में देरी हो रही है तो स्थायी सदस्यों की नियुक्ति की गयी तथा स्थायी अध्यक्ष की भी नियुक्ति की गयी।
लेकिन यदि उत्तराखंड राज्य के सिलसिले में कुछ आज के दिन धरातल पर‌ बात कर ली जाय, तो राज्य में रिक्त सदस्यों, व अध्यक्ष के पदों पर नियुक्ति न होना देरी का प्रमुख कारण है, जब अदालत की बैठक ही नहीं होगीं तो न्याय कैसा, ।इधर काफी समय से उपभोक्ता अदालत के अध्यक्ष में या तो पूर्णकालिक अध्यक्ष जो जिला जज की योग्यता रखता हो होते थे, या पदेन जिला जज ।

कुछ माह पहले राज्य ने जिला जज के पद दायित्व को समाप्त कर पूर्णकालिक अध्यक्ष की ही नियुक्ति की व्यवस्था की है। जिन स्थानों में पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है, वहां अन्य जनपदों के अध्यक्ष को कैम्प लगा काम चलाया जा रहा है, इस व्यवस्था के चलते महिने में तीन दिन अदालत लग पाती है, जिस कारण त्वरित न्याय के सिद्धांतों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।

मामलों में कोरम के अभाव में न्यायालय की पैरवी ,व दस्तावेज का आदान-प्रदान प्रभावित होता है, अक्सर मामलों में अंतिम बहस के बाद भी निस्तारण में समय लग रहा है। आयोग के कोरम के अभाव में सुनवाई ठंडे बस्ते में लम्बे समय पड़ जाती है।
अधिनियम में सुलह समझौता ” मध्यस्थता और लोक अदालत “के भी प्राविधान लाये गये लेकिन कुछ खास अच्छे परिणाम नहीं दिखायी दिये।

कुल मिला कर देखा जाय अव्यवस्था के चलते उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम व्यवहारिकता में अपने उद्देश्य से असफल होता नजर आ रहा है।आज राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस के दिवस पर राज्य सरकार से गुजारिश है है खामियों को दूर कर नियमित अदालत की बैठक लगायी जानी सुनिश्चित करें, तथा यथाशीघ्र राज्य के प्रत्येक जनपदों में अधिनियम के प्राविधानों के अनुसार सदस्यों और अध्यक्ष की नियुक्ति करें न कि एक अध्यक्ष को तीन तीन जनपदों का प्रभार दे कर काम चलाऊ व्यवस्था दी जाय।


वरना उपभोक्ता अदालत एक सफेद हांथी व शो पीस बन रह जाने में देर न होगी और जनता का रूझान और विश्वास उपभोक्ता अदालतों से कम होने में भी देर न लगेगी।

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