उत्तराखंड की देवभूमि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और लोक परंपराओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ का हर त्यौहार प्रकृति से गहराई से जुड़ा है। इन्हीं में से एक सबसे सुंदर और मासूम त्यौहार है ‘फूलदेई’ (Phool Dei), जिसे ‘छम्मा देई’ के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व न केवल वसंत के आगमन का प्रतीक है, बल्कि यह बच्चों और प्रकृति के अटूट प्रेम को भी दर्शाता है।
फूलदेई मनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य प्रकृति का आभार प्रकट करना और नए साल (हिंदू नववर्ष) का स्वागत करना है।
- वसंत का स्वागत: चैत्र मास की संक्रांति के साथ ही पहाड़ों में बुरांश, फ्योंली और बासिंग के फूल खिलने लगते हैं। प्रकृति के इस श्रृंगार को सेलिब्रेट करने के लिए यह पर्व मनाया जाता है।
- समृद्धि की कामना: लोक मान्यता है कि बच्चों के पैरों में देवताओं का वास होता है। जब छोटे बच्चे घर की देहरी (चौखट) पर फूल डालते हैं, तो माना जाता है कि उस घर में साल भर खुशहाली और अन्न-धन की बरकत रहेगी।
- पौराणिक कथा: एक कथा के अनुसार, यह त्यौहार राजा और प्रजा के बीच प्रेम और प्रकृति के संरक्षण के संदेश के रूप में शुरू हुआ था।
फूलदेई की शुरुआत कब हुई, इसका कोई सटीक लिखित इतिहास तो नहीं है, लेकिन यह परंपरा सदियों पुरानी है। यह कत्यूरी और चंद राजाओं के शासनकाल से भी पहले से पहाड़ के जनजीवन का हिस्सा रही है। यह एक विशुद्ध लोक पर्व है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपराओं और गीतों के माध्यम से आज भी जीवित है।
फूलदेई का उत्सव बेहद सरल और मनमोहक होता है। इसमें मुख्य भूमिका छोटे बच्चों की होती है, जिन्हें ‘फूल्यारी’ कहा जाता है।
- फूलों का चयन: सुबह-सवेरे बच्चे बाग-बगीचों और जंगलों से ताजे फूल (फ्योंली, बुरांश, आड़ू के फूल) चुनकर लाते हैं।
- देहरी पूजन: बच्चे टोकरियों (रिंगाल की डलिया) में फूल और चावल लेकर गांव के हर घर में जाते हैं। वे घर की देहरी पर फूल बिखेरते हैं और एक पारंपरिक लोक गीत गाते हैं: “फूल देई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार…” (अर्थ: आपकी देहरी फूलों से भरी रहे, क्षमाशील रहे, द्वार सफल हों और भंडार भरे रहें।)

















