अल्मोड़ा। उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को अपनी आवाज़ से सींचने वाले प्रसिद्ध लोकगायक और वरिष्ठ रंगकर्मी दीवान सिंह कनवाल अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके निधन की खबर से पूरे पहाड़ में शोक की लहर है। ‘दीवान दा’ के नाम से लोकप्रिय कनवाल महज़ एक कलाकार नहीं, बल्कि कुमाऊनी लोक संस्कृति के एक जीवंत हस्ताक्षर थे, जिन्होंने दशकों तक अपनी कला के माध्यम से पहाड़ की मिट्टी की खुशबू को बिखेरा।

​दीवान दा की पहचान पहली कुमाऊनी फिल्म मेघा आ’ के उन गीतों से अमर हो गई, जो आज भी हर पहाड़ी की जुबान पर बसे हैं। विशेषकर ‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ गीत ने उन्हें घर-घर में लोकप्रियता दिलाई। उन्होंने 1980 के दशक में नजीबाबाद रेडियो स्टेशन से अपनी यात्रा शुरू की और आकाशवाणी अल्मोड़ा में ‘बी-हाई ग्रेड’ कलाकार के रूप में अपनी धाक जमाई।

​सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा के खत्याड़ी गांव में जन्मे दीवान दा को अभिनय विरासत में मिला था। उनके पिता त्रिलोक सिंह कनवाल भी प्रसिद्ध कलाकार थे। दीवान दा ने ऐतिहासिक हुक्का क्लब की रामलीला से अपनी अभिनय यात्रा शुरू की। उन्होंने मंच पर विविधता दिखाई—कभी मंदोदरी और परशुराम बनकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया, तो जीवन के अंतिम वर्षों में राजा दशरथ की भूमिका को जीवंत किया।ल

​रोजगार की तलाश में दिल्ली पलायन करने के बाद भी उनका कला प्रेम कम नहीं हुआ। वहां उन्होंने संगीत मनीषी मोहन उप्रेती और एनएसडी के बी.एम. शाह के सानिध्य में रंगकर्म की बारीकियों को सीखा। हालांकि, पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण वे अल्मोड़ा लौटे और को-ऑपरेटिव बैंक में नौकरी की, लेकिन संगीत का साथ कभी नहीं छूटा।

​रिटायरमेंट के बाद उन्होंने ‘अजय-दीवान’ की जोड़ी बनाकर लोक संगीत को नई ऊंचाइयां दीं। उनके कुछ प्रमुख काम इस प्रकार हैं:

  • प्रसिद्ध एल्बम: सुवा, पैलाग, हुड़की घमा-घम, थात बात।
  • लोकप्रिय गीत: ‘दाज्यू हमरि घरवाई रिसै गे’, ‘ह्यूं भरी दाना’, और ‘उत्तरखंड बणियां कतुक साल हैंगीं’
  • सबसे चर्चित प्रस्तुति: शेरदा ‘अनपढ़’ द्वारा रचित गीत— “द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में”

​दीवान सिंह कनवाल का जाना उत्तराखंड के सांस्कृतिक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। सिर पर हैट और चेहरे पर वह चिर-परिचित मुस्कान अब केवल यादों और वीडियो में शेष रहेगी।

पहाड़ की पीड़ा और उल्लास को स्वर देने वाला यह महान कलाकार भले ही विदा हो गया हो, लेकिन उनकी आवाज़ आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेगी।

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