गरमपानी: उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में इन दिनों ‘सिलेंडर संकट’ गहराता जा रहा है। एक तरफ सरकार दावा कर रही है कि गैस की कोई कमी नहीं है, वहीं दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत यह है कि कैंची धाम, खैरना, गरमपानी और अल्मोड़ा जैसे क्षेत्रों में कमर्शियल सिलेंडरों की सप्लाई लगभग ठप हो गई है। इसका सबसे बुरा असर उन छोटे होटल कारोबारियों और ठेला लगाने वालों पर पड़ रहा है, जिन्होंने बैंकों से लोन लेकर अपना स्वरोजगार शुरू किया था।

​प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कैंची धाम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण होटलों में गैस की मांग बहुत ज़्यादा है। स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि जहाँ पहले एक बार में 40-40 सिलेंडर उतरते थे, अब वहां एक-एक सिलेंडर के लिए तरसना पड़ रहा है। यही हाल खैरना और गरमपानी का है, जहाँ हफ़्ते में सिर्फ एक बार गाड़ी आती है। अगर उस दिन सिलेंडर न मिले, तो पूरा हफ़्ता काम बंद करने की नौबत आ जाती है।

​छोटे होटल मालिकों का दर्द गहरा है। एक स्थानीय कारोबारी ने बताया, “हमने लाखों का लोन लेकर ढाबा खोला है। अगर सिलेंडर ही नहीं मिलेगा तो खाना कैसे बनेगा? और अगर खाना नहीं बनेगा तो हम बैंक की किस्त कहाँ से भरेंगे और अपने यहाँ काम करने वाले कारीगरों को तनख्वाह कैसे देंगे?” सरकार ने घरेलू सप्लाई को प्राथमिकता देने के लिए कमर्शियल गैस की सप्लाई में जो कटौती की है, उसने छोटे व्यापार को ‘कोमा’ में भेज दिया है।

​कमर्शियल सिलेंडर की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी (लगभग ₹115 प्रति सिलेंडर) ने लागत बढ़ा दी है। ऊपर से किल्लत के कारण कुछ जगहों पर सिलेंडर की कालाबाज़ारी की खबरें भी आ रही हैं, जहाँ ₹1900 का सिलेंडर ₹3000 तक में बिक रहा है। छोटा कारोबारी इतना महंगा सिलेंडर खरीदकर अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहा है।

​सरकार और तेल कंपनियों का पूरा ध्यान बड़े शहरों और घरेलू उपभोक्ताओं पर है। लेकिन क्या किसी ने उन लोगों की सुध ली जो पहाड़ों की दुर्गम चोटियों पर छोटे-छोटे ढाबे चलाकर अपना गुज़ारा कर रहे हैं?

अगर जल्द ही सप्लाई बहाल नहीं हुई, तो कैंची धाम और अल्मोड़ा जैसे रूट पर चलने वाले सैकड़ों छोटे होटल बंद हो जाएंगे, जिससे हज़ारों लोग बेरोज़गार हो सकते हैं।

मुख्य मांग: छोटे कारोबारियों की मांग है कि दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों के लिए कमर्शियल गैस का विशेष कोटा निर्धारित किया जाए और सप्लाई की फ्रीक्वेंसी बढ़ाई जाए ताकि उनका रोज़गार सुरक्षित रह सके।

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