छंजर सभा की माह जुलाई 2026 की मासिक काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध कवि/ कथा वाचक प्रकाश चंद्र पांडेय जी ने की। इस शुभ अवसर पर सोलह (16) कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। गोष्ठी छंजर सभा के संयोजक डॉ रमेश लोहुमी व संरक्षक आदरणीय त्रिभुवन गिरी महाराज उपस्थित रहे। गोष्ठी का संचालन नीरज पंत ने किया।
उपस्थित कवियोंनेसमसामयिक मुद्दों, सावन, पलायन, भ्रस्टाचार, पानी बचाओ, कौमी एकता, जवलंत समस्याओं पर कविताएं प्रस्तुति कीं साथ ही कुमाउनी, हिंदी व उर्दू का शानदार संगम देखने को मिला । कवियों ने गीत व गज़ल सुनाकर तालियां बटोरी।
काव्य पाठ के कुछ अंश
पड़ गए झूले बागों पर अब,
आया महिना सावन का अब।
हो रहे खुश बच्चे भीगकर,
उछाल रहे अंजुली भर-भरकर,
एक दूजे के ऊपर जल। — डॉ0 दलीप सिंह बोरा
कां, के,कब,किहूं,कसकै यौं सवालौंक जवाब दिण सबूं बसैकि बात न्हां ।
यौं सवालौंक जवाब उइ दि सकौं जैक पास आइ तकलै के न्हां ।
यौ ए्क टुटि-फुटि मकान छू
जो भितेर-भ्यार बै बुजि रौ।
मलि बै आदुक पटालै्ल छाइ छू
बाकि आदुक खन्या्र है रौ।
— डा०के०सी०जोशी “ताजी
वैसे मैं चुप रहता हूं। मगर मैं तब ही बोलता हूं।
जब चतुराई के साथ सब खामोश हो जाते हैं। जब रोटियां दिखलाई जाती हैं
मगर दी नहीं जाती
जब दवाइयां सिर्फ दिखलाई जाती हैं
मगर बांटी नहीं जाती
जब नौकरियां सिर्फ बताई जाती हैं
मगर दी नहीं जाती।
— डॉ रमेश लोहुमी
उत्तराखंड मेरी जनम भूमि
जनम भूमि मेरी करम भूमि
हरिया भरिया डान कान
छाई रै छो बहार जनम भूमि
–कंचन तिवारी
पाणि बचा तू पाणि बचा
रे मनखी तू पाणि बचा
डोवा डोव तू नि कर
च्यूणी नल ठीक कर ।
–दिनेश चंद्र पांडे
हां मुझे चाहिए आजादी
आजादी चाहिए स्वच्छ पानी पीने की
आजादी चाहिए शुद्ध हवा में सांस लेने की
भ्रष्टाचार की बेड़ियों से आजादी चाहिए।
हां मुझे चाहिए आजादी।
— विपुल जोशी
कोई रिश्ता ओ-त-अल्लुक जोड़ा जा सकता है
बेगरज भी अफलाख को छोड़ा जा सकता है।
–सुनील चौहान
सुकून की तलाश में दरबदर हूं घूमती
रूठा है या खो गया उसका पता हूं पूछती
मेरा सुकूं हसीन था मिजाज़ से रंगीन था
शहद सा मीठा कभी और कभी नमकीन था।
–चंद्रा उप्रेती
दम घुट रहा नब्ज रुक रही
अति तीब्र पीड़ा हो रही
अपनी दशा से बाध्य होकर
मैं कहानी कह रही।
–अशोक कुमार
पुष्प सब खिले हैं यहां वाटिका एक है
भांति भांति के लोग यहां फिर भी भारत एक है।
— बिपिन चंद्र जोशी
तस्वीर लेना भी एक बेहतरीन शौक है
इसे ज़िंदा रखिए ।
कभी कभार अपनी और अपनों की तस्वीरें
ले लिया कीजिए ।
ज़िंदगी के खास पल एलबम में समेटना
अच्छा लगता है ।
फुर्सत के पलों में इसके पन्ने पलटना
अच्छा लगता है ।
–कमला बिष्ट ‘कमल’
चल संभल संभल जरा संभल संभल के चल
रास्ता कठिन तेरा तू चल संभल के चल।
तुझे यकीन खुद पे हो मंजिल पे हो नज़र
तू पायेगा मंजिल जरूर छोड़ ना कसर
आयेगी मुश्किल बहुत तेरे रास्ते
तू खायेगा ठोकर बहुत अपने वास्ते।
चल संभल संभल जरा संभल संभल के चल
रास्ता कठिन तेरा तू चल संभल के चल।
–नीरज पंत
ये चिराग जल रहे हैं अभी भी यारो,
रेज़ा-रेज़ा में रोशनी जो अभी बाकी है।
क्यों कदम खींच ले उम्मीद-ए-डगर,
पारे-पारे में भरा जोश अभी बाकी है।
— मीनू जोशी
ये दर्द खामोश है आवारगी जाने कहां गयी
जिंदगी को ढूंढते जिंदगी निकल गयी।
— बीना चतुर्वेदी
घुघुती बासुती भव्वा खालो दुदू भाती।
निनुरी आ निनुरी आ कथां हुणी
भाजी।।
बाबा ज्यू आला ल्याला सुनू की घोड़ी ।
भव्वा राजा घोड़ी चढ़ी जालो दौड़ा दौड़ी।
हाथ में तलवार होली कमर खुखूरी।।
घुघूती बासुती भव्वा से जालो यो
पोथी हजारों
यो राजा सेजालो।
— त्रिभुवन गिरी ” महाराज “
कुण्डलियाँ
1-
एक पैर धर्म खड़ा, दो पर खड़ा इंसान।
चार पैर पर पशु खड़ा, कलि तुम बड़े महान॥
2-
अहंकार जब सिर चढ़े, होता बुद्धि विनाश ।
अपने अपनों से कटे, दूजे से क्या आश ॥
— प्रकाश चंद्र पांडे “अध्यक्ष”
सभा में दो नए कवि छंजर सभा से जुड़े उनका तालियों से हार्दिक स्वागत किया गया

















