देवभूमि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय अंचलों में सावन की विदाई के साथ ही भाद्रपद (भादों) माह का आगमन ‘काला महीना’ या ‘काला मास’ के रूप में जाना जाता है। इसके अलावा, कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में चैत्र (चैत) के महीने को भी इसी श्रेणी में रखा जाता है। इस पूरी अवधि में शादी-विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और नए वाहनों की खरीद जैसे सभी मांगलिक व शुभ कार्यों पर पूर्ण विराम लग जाता है। सदियों से चली आ रही यह लोक-परंपरा केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे हिमालयी जीवन की विकट भौगोलिक परिस्थितियां, मानसून का जल-प्रलय और सामाजिक व्यवस्थाएं गहराई से जुड़ी हुई हैं। 

कब से शुरू होता है काला महीना?

हिंदू पंचांग के अनुसार, श्रावण पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के समापन के तुरंत बाद भाद्रपद माह की संक्रांति से ‘काला महीना’ शुरू हो जाता है। यह अवधि पूरे एक माह यानी अश्विन (आसो) संक्रांति तक चलती है, जब पहाड़ों में ‘सायर’ (शायर) का लोकपर्व मनाकर इस महीने की समाप्ति की जाती है।

पौराणिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। भादों का महीना इस शयन काल का मध्य और सबसे कठिन चरण माना जाता है। पहाड़ी लोक-कथाओं के अनुसार, इस दौरान देवी-देवता भूलोक छोड़कर देवलोक या कैलाश प्रवास पर चले जाते हैं। लोक-विश्वास है कि इस अवधि में आसुरी व नकारात्मक शक्तियां अधिक प्रभावशील होती हैं, जिससे इसे ‘काला’ यानी संकट का समय माना गया।

‘पानी की आफत’ और भौगोलिक सुरक्षा: मुख्य कारण

काले महीने के पीछे का सबसे ठोस व्यावहारिक कारण पर्वतीय क्षेत्रों में मानसून की विभीषिका और जल-भराव है। भादों के महीने में पहाड़ों पर अत्यधिक बारिश, बादलों के फटने, भूस्खलन और नदियों-नालों (गाड़-गदेरों) के उफान की घटनाएं सबसे ज्यादा होती हैं।

  • रास्ते बंद और खतरनाक सफर: प्राचीन काल में जब पक्के पुल और सड़कें नहीं थीं, तब उफनती नदियों को पार करना जानलेवा साबित होता था। इसलिए लोगों को यात्राएं न करने की सलाह दी जाती थी।
  • खाद्यान्न संकट: भादों का समय पुरानी फसल के समाप्त होने और नई फसल (धान, मडुआ, बाजरा) के पकने के बीच का संक्रमण काल होता था। इसे गांवों में ‘तेहरवां महीना’ या तंगी का दौर माना जाता था।
  • स्वास्थ्य व संक्रमण: भारी नमी के कारण पानी दूषित हो जाता था और संक्रामक बीमारियां फैलने का खतरा रहता था।

नवविवाहिताओं का मायके गमन और सामाजिक नियम

काले महीने की सबसे विशिष्ट परंपरा नवविवाहित दुल्हनों का अपने मायके लौटना है।

  • सास-बहू के आमने-सामने आने पर रोक: इस दौरान सास और बहू, तथा दामाद और सास का एक-दूसरे को देखना या एक छत के नीचे रहना वर्जित माना जाता है।
  • सुरक्षा और विश्राम: भीषण बरसात और प्राकृतिक आपदा के दिनों में बेटियों को ससुराल के कठिन शारीरिक श्रम से राहत देने और उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखने के उद्देश्य से मायके भेज दिया जाता था।
  • गर्भधारण से बचाव: स्वास्थ्य दृष्टिकोण से भादों के महीने में गर्भधारण को अनुचित माना जाता था, ताकि शिशु का जन्म अगले वर्ष अत्यधिक गर्मी या बीमारियां फैलाने वाले मौसम में न हो।

आधुनिक दौर में महत्व

आज के समय में सड़कें, संचार और तकनीक सुलभ होने के बावजूद हिमाचल के कांगड़ा, मंडी, शिमला, कुल्लू तथा उत्तराखंड के कुमाऊं व गढ़वाल मंडलों में यह परंपरा पूरी निष्ठा से निभाई जा रही है। यह परंपरा पहाड़ी जनजीवन को प्रकृति के प्रकोप के प्रति सतर्क रहने, संयम बरतने और बेटियों को मायके के स्नेह से जोड़े रखने का एक अनुपम माध्यम बनी हुई है।

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