( कुमाऊनी, गढ़वाली, जौनसारी भाषाओं को राष्ट्रीय पहचान दिलाने में सहायक होगा काव्य संग्रह। हेमा आर्या शिल्पी)
उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं, लोकसंस्कृति और साहित्यिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से उत्तराखण्ड पर्वतीय रचनाकार मंच द्वारा अपने प्रथम साझा काव्य संग्रह “उत्तराखण्ड त्रिवेणी (विरासत के स्वर्णिम पृष्ठ)” के प्रकाशन की तैयारी प्रारम्भ कर दी गई है।मंच की संस्थापिका एवं संपादक हेमा आर्या ‘शिल्पी’ ने जानकारी देते हुए बताया कि यह संग्रह उत्तराखण्ड की तीन प्रमुख लोकभाषाओं कुमाऊँनी, गढ़वाली एवं जौनसारी को समर्पित रहेगा। संग्रह का उद्देश्य प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोक परम्पराओं, लोककला, लोकजीवन और भाषाई धरोहर को साहित्य के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहचान दिलाना है।
इस काव्य संग्रह में प्रदेश एवं देश के विभिन्न क्षेत्रों में निवास कर रहे रचनाकारों की स्वरचित एवं मौलिक रचनाओं को स्थान दिया जाएगा। इसके लिए रचनाएँ आमंत्रित की गई हैं। प्रमुख विषयों में देवभूमि के वीर सपूत, देवभूमि का साहित्यिक वैभव, उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति एवं कला, न्यायप्रिय देवता, प्रकृति का रौद्र रूप एवं आपदाएँ, पहाड़ की संवेदनाएँ एवं पलायन का दर्द, उत्तराखण्डी कौतिक, वन सम्पदा, रीति-रिवाज एवं परम्पराएँ तथा उत्तराखण्ड का प्राकृतिक सौन्दर्य शामिल हैं।साहित्य जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि यह साझा काव्य संग्रह उत्तराखण्ड की लोकभाषाओं को प्रोत्साहित करने तथा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
















